Monday, February 24, 2014

बालिकाओं के प्रति यह कैसी सोच


कन्या शिशुओं की हत्या भारत के लिए कोई नई बात नहीं है, लेकिन पिछले कई सालों में यह अपराध एक नई ऊंचाई पर पहुंच गया है। संयुक्त राष्ट्र संघ ने बालिका शिशु के लिए भारत को सबसे घातक देशों में रखा है। कन्या शिशु की जन्म के एक वर्ष के भीतर या तो जहरीला पदार्थ खिलाकर मार डालते हैं अथवा गर्भ में पल रहे भ्रूण के बालिका होने की जानकारी होने पर उसे गर्भ में ही मार दिया जाता है। एक सास को जब पता चलता है की उसकी बहू के गर्भ में पल रहा शिशु बालिका है तो वह बहू पर गर्भपात करने के लिए दबाव डालती है। ऐसी घटनाएं न ही काल्पनिक हैं और न ही कभी-कभार घटने वाली घटनाएं हैं। ऐसी घटनाएं आएदिन होती रहती हैं यह अलग बात है कि इस तरफ किसी का ध्यान शायद ही कभी जाता है। इस तरह हम बालिका शिशु के जीने का अधिकार छीन रहे हैं या तो उन्हें इस दुनिया का दर्शन करने के पहले ही मार दिया जाता है और नहीं तो उन्हें जन्म के तुरंत बाद हमेशा के लिए सुला दिया जाता है। यह एक क्रूर सच्चाई है कि बालिका शिशु को जीवित रहने का बुनियादी हक तक नहीं है। मनुष्यों में विशेषकर भारतीयों में बेटों को वरीयता देने की एक पुरानी और विसंगत परंपरा है। बेटे संपति हैं और बेटियां कर्ज। भारतीय परंपरा में हम सिर्फ संपति चाहते हैं, कर्ज नहीं। यह कैसी क्रूर स्थिति है जिसमें हम जी रहे हैं। आखिर बालिकाओं के प्रति यह घातक भेदभाव क्यों है? क्या यह अज्ञानता के चलते है अथवा ऐसा लालची होने के कारण है। इसका एक उत्तर पैसा है। हमारी परंपरा में बहुत सी बुराइयां हैं लड़कियों के लिए लड़कों का चयन रुपये और धन के आधार पर किया जाता है। रुपया और धन यानी दहेज ही सबसे बड़ा दुश्मन है जो हमारी बालिकाओं की हत्या के लिए जिम्मेदार है।


वर्तमान वैश्वीकरण के युग में भी लड़कियां माता पिता पर बोझ हैं, क्योंकि उनके विवाह के लिए महंगा दहेज देना होता है। दहेज प्रणाली एक ऐसी सांस्कृतिक परंपरा है जो सबसे बड़ा कारण है बालिकाओं की हत्या के लिए। हम सिर्फ लड़के और लड़कों को ही वरीयता देते हैं। भारत में यह एक ऐसी सांस्कृतिक परंपरा है जिसे कोई भी कानून शायद ही खत्म कर सके। वर्ष 1985से लाखों बालिकाएं इस पवित्र भूमि से गायब हैं। इन आंकड़ों की सच्चाई जानने के बाद भी हमारा दिल नहीं पिघलता। आखिर यह मौन क्यों है और क्या हमारा दिल पत्थर हो गया है। शायद यह एक सच्चाई बन गया है। आखिर उन लाखों लड़कियों की गलती क्या है और क्या उन्हें इस दुनिया में जीने का अधिकार नहीं मिलना चाहिए। यह वह देश है जहां कभी एक महिला प्रधानमंत्री थी और आज एक महिला राष्ट्रपति हंै और कुछ राज्यों में महिलाएं मुख्यमंत्री पद पर आसीन हैं, लेकिन बावजूद इसके हमारे देश में महिलाएं उपेक्षित हैं। लड़कों को वरीयता देने की पुरानी परंपरा बदस्तूर जारी है तथा जन्म के पहले शिशु के लिंग का परिक्षण के कारण देश में लड़का-लड़की का अनुपात पूरी तरह गड़बड़ा गया है। दुनिया में भारत ही एक ऐसा देश है जहां लिंगानुपात एकदम असंतुलित है। वर्ष 2011की जनगणना के आंकड़ों में यह चौंकाने वाली बात सामने आई है। 35राज्यों तथा केंद्रशासित प्रदेशों में से 28में लड़के और लड़कियों के अनुपात में भारी अंतर है।


हरियाणा और पंजाब ऐसे जुड़वें राज्य हैं जहां बालिका शिशु को नफरत से देखने की प्रवृत्ति एकदम ऊंचाई पर है। इस बात का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि इस समृद्ध राज्य में आज 15 से 45 उम्र के 36 फीसदी लोग अविवाहित ेंहैं। इसी के चलते इन दोनों राज्यों में अविवाहित पुरुषों के आंकडे़ समाज के संतुलन को बिगाड़ रह हैं। पंजाब में आज भी लगातार हो रही कन्या भ्रूण हत्या के चलते यह अंतर लगातार बढ़ता जा रहा है। दुर्भाग्य से पंजाब में समृद्ध,शिक्षित और शहरी क्षेत्रों में रहने वालों की संख्या काफी है। 2006के राष्ट्रीय पारिवारिक स्वास्थ्य सर्वेक्षण से पता चलता है कि पंजाब में आई समृद्धि ने कन्या भ्रूण हत्या को रोकने में बहुत बड़ी भूमिका निभाई है। आंकड़ों से पता चलता है कि 2001 में जहां प्रति 1000 पुरुष की तुलना में 793 महिलाएं थीं वहीं वर्ष 2006 में यह घटकर 776 हो गया। शहरी क्षेत्रों में यह अनुपात घटकर 761तक पहुंच गया है। सस्ते और अनियंत्रित तकनीकी विकास के चलते कन्या भ्रूण की हत्या लगातार बढ़ रही है। विशेष कर उच्च और मध्यम वर्ग के लोगों में इसके चलते कुछ एक दिन पहले पैदा हुई नवजात बालिकाओं को झाडि़यों, सार्वजनिक शौचालयों, बगीचों और कचरे के डिब्बों में फेंक दिया जाता है। यह सब इसलिए है, क्योंकि कोई भी बिना बेटे के नहीं रहना चाहता है। इससे जुड़ा कोई भी कानून इसे रोक पाने में फिलहाल समर्थ नहीं दिख रहा। इस मामले में महाराष्ट्र भी पीछे नहीं है। यहां भी वर्ष 1961 से लगातार महिलाओं का औसत घटा है। वर्ष 1962 में जहां प्रति 1000 पुरुष के पीछे महज 936 महिलाएं थीं वहीं वर्ष 2001 में 922 तथा 2011 में 883 महिलाएं रह गई हैं। यह निम्नतम लिंगानुपात न सिर्फ झोपड़-पट्टियों और कम आय वर्ग वालों के बीच है, बल्कि समृद्ध लोगों में भी है। महाराष्ट्र के मराठवाड़ा क्षेत्र और बीड़ जिले में सबसे कम लिंगानुपात है। वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार बीड़ जिले में तो शून्य से 6 वर्ष की आयु वाले बालक- बालिकाओं का लिंगानुपात 100 के मुकाबले 801 है जो महाराष्ट्र में सर्वाधिक है। यही औसत पूरे राज्य में 1000 की तुलना में 833 का है।


वर्तमान आंकड़ों के मुताबिक भारत में पुरुषों की तुलना में 40 लाख महिलाएं कम हैं। यह अंतर लिंग परीक्षण का परिणाम है और प्रत्येक माह देश भर में 50 हजार से अधिक कन्या भ्रूण का गर्भपात किया जाता है और न जाने कितने ही लड़कियों की या तो हत्या कर दी जाती है अथवा उन्हें लावारिस छोड़ दिया जाता है। कन्या भ्रूण के गर्भपात की बढ़ती दर का पता आंशिक रूप से अल्ट्रासाउंड सेवा देने वाले क्लीनिक की बढ़ती संख्या से लगाया जा सकता है। भारत में लिंग परीक्षण तथा लिंग के आधार पर होने वाला गर्भपात दोनों ही अपराध है, लेकिन इस पर कानूनी कार्रवाई बहुत ही कम हो पाती है। यह सिर्फ गर्भवती महिलाओं और नवजात बच्चियों पर ही मंडराता खतरा नहीं है, बल्कि इसका असर अकेले पड़ते पुरुषों के विवाह की समस्या तक जा पहुंचा है। इस वजह से कितने ही परिवार अपने बेटों के लिए ब्लैक मार्केट से दुल्हन खरीदते हैं जो आगे चलकर मानव तस्करी को बढ़ावा देने का काम करते हैं। हरियाणा में अल्ट्रासाउंड के जरिये शिशु के लिंग का पता लगाने का प्रचलन जोरों पर है। यहां की सरकार इससे पूरी तरह वाकिफ भी है, लेकिन उसके प्रति उदासीन है। हरियाणा में लड़की दुर्लभ और अवांछित चीज है। भारत के लगभग सभी राज्यों में कुछ ऐसा ही हाल है। यह लड़कियों की जानबूझकर संख्या घटाने का परिणाम है। आश्चर्य की बात यह है कि पंजाब के तमाम अनाथालयों में 70 फीसदी से अधिक लड़कियां ऐसी हैं जो अपने परिवार द्वारा त्याग दी गई हैं।

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स्त्री-पुरुष में कहां है बराबरी


आजकल स्त्री पुरुष की बराबरी की बात बहुत की जाती है। कहा जाता है कि युवा पीढ़ी ने, खासकर शहरी युवाओं ने पुरानी मान्यताओं और रूढि़यों को काफी पीछे छोड़ दिया है। अब नौजवान अपनी पत्नी या गर्ल फ्रेंड को न सिर्फ अपने बराबर समझते हैं बल्कि उनकी तरक्की देखकर खुश होते हैं और उन्हें आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करते हैं। लेकिन अगर गौर से देखे तो कुछ मामलों में स्थिति जस की तस है। इसका प्रमाण मुझे कुछ दिनों पहले हुई एक घटना से मिला।

मेरी एक छब्बीस वर्षीय सहेली के बॉयफ्रेंड को सहेली के एक दोस्त ने अपने भाई की शादी पर बुलाया। बहुत बुलाने पर वह मेरी सहेली के साथ चला तो गया लेकिन शादी में पूरे समय अनमना रहा। उसके अनुसार, उसे ऐसा लग रहा था जैसे वह अपनी गर्लफ्रेंड का बॉडीगार्ड बनकर शादी में आया है। वहां वह अपनी गर्लफ्रेंड के अलावा किसी को नहीं जानता था। जबकि मेरी सहेली का कहना था कि वह उसे जानता है, यही बहुत है। जब उसके बॉयफ्रेंड के किसी दोस्त की शादी होती है तो वह भी तो बिना सवाल जवाब किए वहां चली जाती है।

जबकि ऐसी शादियों में उसकी भी यही स्थिति होती है। वह भी उन शादियों में वह अपने बॉयफ्रेंड के अलावा किसी को नहीं जानती। लेकिन वह वहां खुद को इस तरह अनमना सा महसूस नहीं करती। और अगर करती भी है तो जाहिर नहीं होने देती। फिर वह क्यों ऐसा कर रहा था? इस पर उसका जवाब बहुत अजीब था- उसका कहना था कि तुम लड़की हो। तुम्हें मेरे दोस्तों के यहां जाने में कोई ऐतराज नहीं होना चाहिए, लेकिन मैं एक लड़का हूं इसलिए तुम्हारे साथ तुम्हारे दोस्तों के यहां जाने में कंफर्टेबल महसूस नहीं करता। मेरी सहेली ने उससे पूछा कि क्या तुम शादी के बाद भी ऐसा ही सोचोगे? उसका जवाब था- शादी के बाद तो तुम मेरी जिम्मेदारी हो जाओगी।

इसलिए तब की बात अलग है। मैंने कई बार ऐसा भी देखा है कि अगर किसी एकल परिवार में कोई दोस्त या रिश्तेदार अपने यहां किसी समारोह में निमंत्रण देने के लिए फोन करे और वह पत्नी रिसीव कर ले तो कई पुरुषों को ऐसा लगता है कि हमें तो आमंत्रित किया ही नहीं गया। खासकर तब जब निमंत्रण पत्नी के मायके की तरफ के रिश्तेदार या दोस्त की तरफ से हो।

जबकि पत्नी पर ये बात कतई लागू नहीं होती। पति को निमंत्रित करने पर वह भी स्वत: निमंत्रित हो जाती है और कभी इस बात को इशू नहीं बनाती। दरअसल हम कितनी भी तरक्की कर लें, लेकिन पुरुष का दंभ कहीं न कहीं अपना सिर उठा ही लेता है। शायद इसके पीछे पुरुष के खुद को सर्वेसर्वा समझने की वही पुरातन सोच है जो पीढ़ी दर पीढ़ी एक से दूसरे पुरुष में अनजाने में ही आ जाती है।


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महिलाओं का रिमोट कंट्रोल


जब से नारी जाति में शिक्षा के प्रति जागरूकता आई है और उसने अपने मुबारक कदम अपनी घर की दहलीज से बाहर  निकाले है उसके बाद से ही उसका ज्यादातर रिमोट पुरुषों ने अपने हाथ में रखने की कोशिश की है तो किन्ही विशेष परिस्थितियों में उसने खुद ही पुरुषों के हाथ में चाहे और अनचाहे , अनजाने में ही अपना रिमोट सिस्टम सौंप दिया है …..
अपने नम्बर बढ़वाने + पास करवाने की ऐवज में  कभी भूले भटके वोह खुद ही , और  ज्यादातर मामलों में जबरन उसका रिमोट कलियुगी शिक्षकों द्वारा अपने हाथ में ले लिया जाता है ….. उसके बाद नौकरी का नियुक्ति पत्र पाने + तरक्की पाने के लिए भी महिलाए अपना रिमोट पुरुषों के हाथ में स्वेच्छा से देती रही है ….. रिशेप्शनिस्ट तथा पर्सनल सेक्रटरी की पोस्ट पर कार्यरत महिलाओं से तो यह आशा हर हाल में की ही जाती है + रखी जाती है की वोह अपने बॉस के रंग में रंग कर उसकी  चहेती बन कर दिखलाये …..
महिलाएं किसी भी क्षेत्र में चली जाए बस उनसे एक ही आशा रखी जाती  है और बस एक ही अपेक्षा की जाती  है ….. महिलाए किसी भी जगह पर सुरक्षित नहीं है यहाँ तक की धार्मिक स्थलों पर भी धर्म के ठेकेदारों ने धार्मिक स्थलो की मान मर्यादा को बार बार भंग किया है तथा वहां पर भी औरतों की इज्जत को तार तार किया है ….. दुःख की बात है की किसी भी धर्म के धार्मिक स्थान इन कामो से अछूते  नहीं है , और आजकल के आधुनिक ढ़ोंगी और पाखण्डी बाबाओं के तो कहने ही क्या ?….. शिकायत मिलने पर इनके डेरों से अक्सर ही छापामारी में अश्लील सामग्री  के साथ साथ लड़किया मिल जाती  है जिनकी आत्मा तक का कंट्रोल स्वामी जी के हाथ में पकडे अद्रश्य रिमोट में समाया होता है …..
और अगर  राजनीति की बात करे तो इसके बारे में एक बड़ी ही मशहूर कहावत है की "लुच्चा लफंगा चौधरी और बदनाम औरत प्रधान" ….. इस क्षेत्र में कोई विरली ही महिला होगी जिसका की रिमोट किसी नेता के हाथ में ना हो …. आप सोचते होंगे की सब कुछ पता होते हुए भी औरते इस क्षेत्र में अपनी किस्मत क्यों आजमाती है ….. इस फील्ड  में पैसा + शोहरत और सत्ता का आकर्षण इनको अपनी तरफ खींचता है ….. लेकिन अपने अकेली के बलबूते भी शायद ही किसी ने राजनीती में प्रवेश किया हो + पैर रख कर अपना मुकाम बनाया हो ममता दीदी की तरह ….. उनको शुरुआत में या फिर बाद में किसी ना किसी पुरुष का सहारा लेना ही पड़ता है कुमारी जयललिता और कुमारी मायावती की तरह ….. और इस फील्ड के यह घाघ नेता इनका क्या हश्र करते है यह खुद इनके इलावा कोई भी नहीं जानता …..
राजनीति के बाद बात आती है माडलिंग तथा फ़िल्मों से जुड़े हुए  क्षेत्र की ….. इसमें नारी कितनी सुरक्षित है यह किसी से कहने या बताने की जरूरत नहीं है ….. लेकिन यहाँ पर उसका रिमोट अलग अलग समय में अलग -२ पुरुषों के हाथो में बदलता रहता है ….. बड़े पर्दे पर दिखने की चाहत  की बात तो रहने दीजिए हमारे बुद्धू बक्से में प्रसारित होने वाले धारावाहिकों में भी रोल देने के नाम पर पर्दे के पीछे बहुत कुछ होता है …..
इसके बाद बारी आती है जबरन वैश्याव्रती के धन्धे में धकेल दी  गई महिलायों की …. अपने पिछले जन्म के पापों की सज़ा भुगत रही उन बेचारियों के एक ही समय में अनेको हाथों में रिमोट कंट्रोल रहते है जैसे की कोठे वाली बाई और दलाल वगैरह तथा इस पेशे से जुड़े हुए गुंडों के हाथों में …. लेकिन आजकल की  आधुनिक हाई फाई सोसाइटी की देन  कालगर्ल देखने में चाहे अपनी मर्जी से इस धन्धे में आई हुई दिखती हो लेकिन असल में उसका रिमोट भी किसी ना किसी रूप में किसी पुरुष के हाथ में ही होता है ……
और सबसे ज्यादा दुःख तो तब होता है जब मै इस प्रकार की खबरों को  की शादी / नौकरी  का झांसा देकर शारीरिक शोषण / बलात्कार  करता रहा" )

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खाने के बदले विदेशियों ने बनाई न्यूड फिल्म!  
रोहतक के प्रोटेक्शन होम में महिलाओं के यौन शोषण का सनसनीखेज खुलासा हुआ। प्रोटेक्शन होम में रहने वाली महिलाओं ने आरोप लगाया है कि अक्सर यहां विदेशी नागरिक आते थे और उनकी नंगी तस्वीरें उतारते थे।महिलाओं की ओर से लगाए गए आरोप गंभीर हैं लेकिन केस दर्ज करने के लिए पुख्ता सबूतों की जरूरत है।

"एनजीओ भारत विकास संघ" प्रोटेक्शन होम का संचालन करता है। मई में बाल कल्याण संरक्षण के राष्ट्रीय आयोग ने एनजीओ के दफ्तर पर छापा मारा था। एनसीपीसीआर ने 9 मई को प्रोटेक्शन होम से 10 से 15 की उम्र के 90 नाबालिक को छुड़ाया था। होम की मालकिन जसवंती देवी पर इममोरल ट्रैफिकिंग,प्रताड़ना और बंधुआ मजदूरी को प्रोत्साहित करने का केस दर्ज किया गया था।

हरियाणा और पंजाब हाईकोर्ट की ओर से गठित चार सदस्यीय टीम के सामने महिलाओं ने बताया कि मुंबई से आए विदेशी नागरिकों ने उनकी नंगी तस्वीरें उतारी थी। उन्होंने अच्छा खाना और अच्छे कपड़े देने का लालच देकर नंगी फिल्में उतारी थी। जसवंती देवी का दामाद जय भगवान लड़कियों को विदेशियों के आने से पहले सूचित करता था। विदेशी मेहमानों की यहां खूब आवभगत होती थी।

ये खुलासे चौंकाने वाले हैं। जांच रिपोर्ट कोर्ट के सामने पेश किए जाने के बाद ही पूरे मामले से पर्दा हटेगा। अगर मामले की जांच हरियाणा से बाहर की किसी स्वतंत्र एजेंसी से कराई जाती तो पीडितों को न्याय मिलने की ज्यादा गुंजाइश है।

सूत्रों के मुताबिक विदेशी लोगों के खिलाफ आरोपों की बात जसवंती देवी से पूछताछ के दौरान भी सामने आई थी। हरियाणा पुलिस ने बुधवार को तीन सदस्यीय एसआईटी का गठन किया है जो पुलिसकर्मियों द्वारा यौन शोषण के आरोपों की जांच करेगी।

आरोप है कि प्रोटेक्शन होम में रहने वाली लड़कियों को चंडीगढ़ में आला अधिकारियों के यहां होने वाली आलीशान बर्थडे पार्टियों में ले जाया जाता था। 18 साल से अधिक उम्र की लड़कियों को पैसे लेकर उम्र दराज लोगों से जबरन शादियां करा दी जाती थीं।
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अजूबा: 84 साल की महिला के पेट में 44 साल का बच्चा!



ब्राजील। सामान्य महिला का गर्भकाल 9 महीने का होता है। कई बार ये कम भी हो सकता है और एक-दो दिन आगे भी। लेकिन ब्राजील में 84 वर्ष की महिला के गर्भ में 44 साल स्टोन बेबी है।
कुछ दिन पहले डॉक्टरों ने इस महिला का एक्स-रे किया जिसके बाद पता चला कि महिला के गर्भ में अविकसित मृत भ्रूण है। दरअसल, ये महिला 40 साल पहले गर्भवती हुई थी, उस दौरान ली गई दवाओं की वजह से बच्चा गर्भ में मर गया था। जिसके कारण इस महिला के पेट में तेज दर्द हुआ करता था। इसका इलाज करने महिला टोकांटिस स्टेट के नैतिविदाद अस्पताल गई थी। जब इस महिला का एक्स-रे किया गया तो उन्हें इस महिला के पेट में 20 से 28 हफ्ते का स्टोन बेबी मिला। जिसके बाद उसे पोर्टो नेकिनोल अस्पताल में शिफ्ट कर दिया गया।
महिला ने डॉक्टरों को बताया कि वो करीब 44 साल पहले गर्भवती हुई थी। महिला ने बताया कि उसने एसी ही शिकायत पहले भी की थी लेकिन गांव में कोई अच्छा अस्पताल न होने की वजह से बीमारी का पता नहीं चल सका। वहां उसे दवा दे दी जाती थी जिसके बाद उसे कुछ राहत हो जाती थी।
डेली मेल के अनुसार, जब महिला का एक्स-रे किया गया तो उन्हें स्टोन बेबी का पता चला। बच्चे का मुंह साफ समझ आ रहा था। हालांकि डॉक्टर अभी इसे सर्जरी से बाहर निकालने पर विचार कर रहे हैं लेकिन उनका कहना है कि ये आश्चर्य चकित करने वाला है।



नौ साल की बच्ची ने पढी 364 किताबें सिर्फ सात महीनों में

नौ साल की बच्ची ने पढी 364 किताबें सिर्फ सात महीनों में
 एक नौ साल की लडकी ने ऎसा काम कीया जिसे आप सुनकर हैरान हो जायेंगे। आपको पता है इस नौ साल की छोटी सी लडकी ने सिर्फ सात महीनों में ही 364 किताबें पढ चुकी है क्यों चौक गये न आप लेकिन ऎसा ही कुछ एक लडकी ने कर दिखाया है। रिपोर्ट के अनुसार, चेशायर के एश्ले में रहने वाली फेथ जैक्शन खुद को टेलीविजन कंप्यूटर गेम से दूर रखती है। वह इनकी जगह रोआल्ड दाल्ह या हैरी पॉटर को पढना ज्यादा पसंद करती है। उसे किताबों से बेहद लगाव है। जब वह प्राइमरी स्कूल में थी तब शिक्षकों द्वारा प्रोत्साहित किए जाने पर उसमें किताबों के प्रति प्रेम बढा। फेथ की मां ने कहा कि वह कहती है कि उसे टीवी या कंप्टूटर गेम की तरह ही किताबों को पढने में बेहद मजा आता है।

 फेथ ने कहा कि उसे सबसे ज्यादा जानवरों या जादू या रोमांच की किताबें पसंद हैं। साथ ही यह भी कहती है कि लेकिन मेरी दुनिया सिर्फ किताबों तक ही सीमित नहीं है। मैं सप्ताह में चार घंटे जिम्नास्टिक करती हूं। इसके अलावा कराटे क्लासेस जाती हूं, नेटबॉल खेलती हूं और ड्रम बजाना सीख रही हूं। तो देखा आपने इतने सारे टेलेंट एक छोटी सी वो भी सिर्फ नौं साल की लडकी में देखने को मिला है। शायद किसी भी और बच्चो में ये देखने को मिले।

कहां जा रहे हैं ये बच्चे

भारत में बच्चे खबर नहीं बनते.. बच्चों की छिटपुट खबरें आती हैं, यौन हिंसा या दुष्कर्म का शिकार होने पर। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के अनुसार हर आठ मिनट में एक बच्चा गायब हो रहा है। आखिर ये कौन-सा जाल है जहां फंस रहा है मासूम जीवन ?

सन् 2011 में भारत में 90 हजार बच्चे गायब हुए। इनमें आधे से ज्यादा केस आज भी अनसुलझे हैं। सिर्फ 15 हजार मामलों में खोजबीन हुई। भूकंप, बाढ़, सुनामी आदि प्राकृतिक विपदाओं के बाद बेघर हुए बच्चों पर भी राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय बाल माफियाओं की गिद्ध दृष्टि बनी रहती है! यूएस के स्वास्थ्य और मानव सेवा विभाग के अनुसार 6 से 8 लाख लोग सालाना दुनिया भर में मानव व्यापार में धकेले जाते हैं, जिनमें से 14500-17500 पीड़ित अकेले यूएस में भेजे जाते हैं। दुनियाभर के इन पीड़ितों में आधे से ज्यादा बच्चे हैं! फीनिक्स आज के समय में बच्चों की किडनैपिंग राजधानी है। विशेषज्ञों का मानना है कि किडनैप किए गए ये बच्चे पूरी दुनिया में 'सेक्स टॉय' के नाम पर भेजे जाते हैं! पूरी दुनिया में तकरीबन 20 लाख बच्चे यौन गुलामी करने को मजबूर हैं। जाहिर है उनमें भारतीय बच्चे भी हैं। कुछ समय पहले 'एकपैट इटालिया' नाम की समाचार एजेंसी ने खुलासा किया है कि दुनियाभर में हर दो मिनट में एक बच्चा यौन शोषण का शिकार होता है। अध्ययन रिपोर्ट में कहा गया है कि बाल वेश्यावृत्ति, बाल यौन पर्यटन, बाल अश्लीलता और यौन शोषण के लिए बच्चों की तस्करी अब पुरानी बातें हो चुकी हैं। इन दिनों गरीब विकासशील राष्ट्र, यहां तक कि 

इटली जैसे संपन्न राष्ट्र 'सेक्स टॉय' के रूप में बच्चों की तस्करी के लिए उपयुक्त बाजार बन रहे हैं। इसी एजेंसी की रिपोर्ट के अनुसार हर साल हजारों पर्यटक बच्चों के साथ यौन संबंध बनाने के लिए विदेश यात्रा करते हैं! भारत में इस तरह का कोई अध्ययन न होने के कारण यह साबित नहीं होता कि हम दूध के धुले हैं।

 

भारत बाल वेश्यावृत्ति के लिए एक स्रोत भी है और गंतव्य भी। एक अनुमान के मुताबिक हर साल 12 से 50 हजार स्त्रियां और बच्चे नेपाल और बांग्लादेश जैसे पड़ोसी देशों से वेश्यावृत्ति के लिए भारत लाए जाते हैं। महिला एवं बाल विकास मंत्रालय के अनुसार वेश्यावृत्ति के व्यापार में 40 प्रतिशत बच्चे हैं। छोटी लड़कियों की मांग बढ़ रही है, छोटे लड़के भी इससे अछूते नहीं हैं। भारत में जो पर्यटन उद्योग फल-फूल रहा है उसके पीछे बाल वेश्यावृत्ति भी एक प्रमुख कारण है। न सिर्फ भारत में, बल्कि पूरी दुनिया के बच्चे भयानक यौन शोषण के शिकार हो रहे हैं।असल में पूरी दुनिया में जो यौन उन्माद बढ़ा है उसने न सिर्फ स्त्रियों को 'यौन वस्तु' में तब्दील किया है, बल्कि बच्चों को भी 'सेक्स टॉय' के रूप में देखने/भोगने के घिनौने चलन को बढ़ाया है। कुछ चीजें ऐसी भी हैं, जो प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से बच्चों को स्वयं ही सेक्स उद्योग के लिए खुद को तैयार करने के लिए उकसा रही हैं। छोटे बच्चों के लिए होने वाली 'सौंदर्य प्रतियोगिताएं' बच्चों, खासतौर से लड़कियों को 'सेक्सुअलाइज' करती हैं। बाल मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि ऐसी प्रतियोगिताएं लड़कियों के दिमाग में बैठा देती हैं कि सुंदर दिखना ही उनकी जिंदगी का सबसे बड़ा लक्ष्य है। चेहरे पर मेकअप की मोटी परत और चेहरे पर युवा होने जैसे भाव, ये सारी चीजें उनके दिमाग पर अनावश्यक दबाव बनाती हैं। बच्चे स्वेच्छा से अपनी मासूमियत और बचपना खोकर समय से पहले युवा दिखना और महसूस करना चाहते हैं। स्वयं मां-बाप बच्चों को इन चीजों के लिए तैयार करते हैं। अपनी दबी हुई या अधूरी इच्छाओं को वे बच्चों पर लादते हैं। फैशन शो या सौंदर्य प्रतियोगिताओं में भाग लेना बच्चों के लिए वैसा ही खतरनाक है जैसे छोटी उम्र में मां बनना!

 घरों के भीतर होने वाले यौन शोषण को मां-बाप काफी हद तक अपने स्तर पर रोक सकते हैं। बच्चों का ज्यादा ध्यान रखकर, उनकी बातों पर यकीन करके, उन्हें ऐसी घटनाओं की जानकारी देकर, चौकन्ना रहने की सीख देकर। लेकिन बड़े पैमाने पर हो रहे बाल यौन अपराधों को सरकार और पूरी व्यवस्था की ईमानदारी के बिना रोकना असंभव है। हालांकि बच्चों की यौन हमलों से सुरक्षा संबंधी एक बिल 2012 में पास किया गया है, लेकिन आशंका यही है कि इस बिल का भी वही हश्र होगा जो कि बाकी कानूनों का हो रहा है। कुछ समय पहले सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि बाल यौन शोषण के मामले में चुप्पी एक जुर्म है। यदि बच्चों के यौन शोषण की जानकारी होने पर भी पुलिस को सूचित नहीं किया जाता, तो यह एक गंभीर अपराध है। इस संबंध में केंद्र व राज्य सरकारों को स्पेशल जुवेनाइल पुलिस यूनिट की स्थापना के आदेश भी दिए गए हैं ताकि पीड़ित बच्चों की सुरक्षा और संबंधित कार्रवाई जल्दी हो सके। 

 निराश करने वाला सच यह है कि निकट भविष्य में बाल यौन शोषण के और ज्यादा बढ़ने की संभावना है। अभी तक तो इस खौफनाक सच को खुलकर स्वीकार करने में ही सांस फूल रही है। फिर ऐसे में मर्ज की दवा भला कैसे हो सकती है? बस अपने बच्चों का हाथ कसकर पकड़े रहिए, उनको चौकन्ना रखिए और उन पर विश्वास कीजिए। सावधान रहिए शिकारी हर तरफ घात लगाए बैठे हैं। इंसान अपने बच्चे के लिए बहुत कुछ खरीद सकता है, पर बचपन नहीं खरीद सकता। किसी भी कीमत पर नहीं। जितना स्वस्थ बचपन होगा भावी समाज की नींव उतनी ही मजबूत होगी। 

MATRIMONIAL RELATION