Monday, February 24, 2014

दाढ़ी वाली महिला: मुझे ख़ुद से प्यार है

हरनाम कौर, दाढ़ी वाली महिला
 हरनाम कौर 23 साल की हैं. हरनाम कौर को  है जिसकी वजह से बालों का अतिरिक्त विकास होने लगता है. लेकिन वो पिछले सात सालों से चेहरे के बालों को बढ़ने दे रही हैं.
वो कहती हैं, "मैं एक आम औरत की तरह नहीं दिखना चाहती."
लेकिन हरनाम का नज़रिया हमेशा इतना सकारात्मक नहीं था.
जब वो 11 साल की थीं तो उनके चेहरे पर बाल आने शुरू हो गए. धीरे-धीरे उनके सीने और बांहों पर भी बाल आने शुरू हो गए.
इसकी वजह से उन्हें लोगों के दुर्व्यवहार का सामना करना पड़ता था.
वो बताती हैं, "बारहवीं तक मेरे साथ हमेशा ही दुर्व्यवहार होता था. यह बहुत डरावना था. मुझे सुबह उठने से डर लगता था."
'मैं क़ैद में थी'
"जब मैं किशोरी थी तब पत्रिकाओं और टीवी पर ख़ूबसूरत औरतों को देखकर मैं भी उनके जैसी दिखना चाहती थी."
हरनाम कौर
अपनी किशोरावस्था के दिनों में हरनाम अपनी दाढ़ी को लेकर इतनी शर्मिंदा रहती थीं कि वो हफ़्ते में दो बार वैक्सिंग करती थीं. उन्होंने ब्लिचिंग और शेविंग करने की भी कोशिश की.
वो बताती हैं कि इससे उनकी समस्या और बढ़ गई. इससे बाल मोटे होने लगे और शरीर के दूसरे हिस्सों में भी फैलने लगे.
14 साल की उम्र तक वो अपने आपको लेकर इतने संवेदनशील हो गईं कि उन्होंने घर से निकलना छोड़ दिया. वो खुद को नुकसान पहुंचाने यहां तक कि आत्महत्या के बारे में भी सोचने लगी थीं.
वे कहती हैं, "मैं अपने बेडरूम में क़ैद हो गई थी. मैं हमेशा वहीं रहती थी. यह सब तक़रीबन एक साल तक चला. फिर मुझे लगा कि इससे कोई फ़ायदा नहीं होने वाला. खुद को नुकसान पहुंचाने से फ़ायदा होने के बजाय मुझे काफ़ी भावनात्मक चोट पहुंची."
हरनाम बताती हैं, "मुझे लगता है कि जब तक कोई उस स्थिति में न हो जिसमें दूसरा है, तब तक वो उसकी बात नहीं समझ सकता."
वो कहती हैं, "जब मैं किशोरी थी तब पत्रिकाओं और टीवी पर ख़ूबसूरत औरतों को देखकर मैं भी उनके जैसी दिखना चाहती थी."
वो कहती हैं, "यह एक बहुत भयावह अनुभव था कि मेरी हर दोस्त का बॉयफ़्रेंड था लेकिन मुझे कोई पसंद नहीं करता था."
'मैं खिल गई हूं'
"मेरा आत्म-विश्वास बढ़ने के बाद मैं नए लोगों से मिलने-जुलने में ज़्यादा सहज हो गई हूं."
हरनाम कौर
हरनाम को उनके छोटे भाई और उनके दोस्तों से काफ़ी मदद मिली और उन्होंने 16 की उम्र में सिख धर्म में दीक्षित होने के बाद से रेज़र का इस्तेमाल करना छोड़ दिया.
वो कहती हैं, "मैंने बालों के साथ ख़ुद को स्वीकार करने के लिए लंबी लड़ाई लड़ी है. मैंने आखिरकार अपना प्राकृतिक स्वरूप पा लिया."
वे कहती हैं, "मैं अभी भी तक़रीबन एक महीने या उसके बाद बाल बनाती हूँ. लेकिन अब मैं दाढ़ी बढ़ाने का आध्यात्मिक महत्व समझ चुकी हूं. यह समझने के बाद ही शायद मैंने सोचा कि अब मैं यह नहीं करूंगी. मैं अपना रेज़र फेंक दूंगी."
वे कहती हैं कि उनके धर्म ने उन्हें बहुत आत्मविश्वास दिया है.
वे कहती हैं, "मुझे लगता है कि आखिर मैंने अपना वास्तविक स्वरूप पा लिया है."
वे कहती हैं, "मेरा आत्म-विश्वास बढ़ने के बाद मैं नए लोगों से मिलने-जुलने में ज़्यादा सहज हो गई हूं. मुझे लगता है कि मैं खिल गई हूं."

युवती ने दांतों से काट डाली जबरन चुंबन लेने वाले मनचले की जीभ

भोपाल: किस्सा मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल का है, जहां एक लड़की ने उसे कई दिन से लगातार छेड़ रहे मनचले को जोरदार सबक सिखाया... पुलिस के मुताबिक कमलेश नामक मनचले ने जब सरेआम बीच सड़क पर लड़की को दबोचकर उसका जबरन चुंबन लिया, तो लड़की ने दांतों से उसकी जीभ पर इतनी ज़ोर से काटा कि उसकी जीभ कटकर अलग गिर गई...

भोपाल के कमला नगर थानाक्षेत्र के प्रभारी  बताया कि पीड़ित युवती से कमलेश नामक यह मनचला कई दिनों से छेड़छाड़ कर रहा था, लेकिन बुधवार को उसने सारी हदें पार कर दीं, और अकेली पाकर बीच सड़क पर युवती को दबोचकर उसका चुंबन लेने लगा, तब युवती ने अपने दांतों से उसकी जीभ पर इतनी बुरी तरह काटा कि वह लगभग एक इंच कटकर अलग हो गई...

उन्होंने बताया कि युवती का कहना है कि यह लड़का उससे एकतरफा प्यार करता था और लम्बे समय से आते-जाते उससे छेड़छाड़ करता था... बुधवार दोपहर को जब वह अकेली जा रही थी, तभी उसने बीच सड़क पर उसे बाहों में जकड़कर जबरदस्ती चुंबन लेना शुरू कर दिया... ने बताया कि जब युवती के विरोध करने पर भी आरोपी नहीं माना तो उसने कमलेश की जीभ काट ली...
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Sunday, February 2, 2014

वर्चस्व, वासना और रेप

2014 की ये जनवरी तो मानो हमारी उम्मीदों और सपनों की कम, आशंका और आक्रमण की जनवरी साबित हो रही है। इस एक महीने में पश्चिम बंगाल के वीरभूम से लेकर देश भर में जैसे वहशियों ने नई यातना पॉकेट्स तैयार कर ली हैं। 27 जनवरी नाजी यातना शिविर आउश्वित्ज से मुक्ति की 69वीं सालगिरह है। लेकिन साढ़े छह दशकों बाद हम यातना शिविर पूरी दुनिया में पाते हैं। सबसे ज्यादा महिलाएं निशाने पर हैं। ये शिविर जेहन से लेकर घर, मुहल्ला, शहर, गांव, सड़क सब जगह फैले हैं। 64 साल के गणतंत्र में ये कुत्सित अभियान क्योंकर जारी है, इस पर बोलना तो दूर, हरकत तक नहीं होती। राष्ट्रपति का देश के नाम संदेश इन घृणितों को ललकारता नहीं है। कहीं कुछ नहीं होता। एक भीषण और उबाऊ यथास्थिति पसरी हुई है। और इसी में कुछ एक्शन छिटपुट होता है तो बाजुएं फड़कने लगती हैं, अरे देखो अब क्रांति हुई। कुछ नहीं होता। एक मोमबत्ती भी पूरी नहीं पिघल पाती। इतिहास और सदी की बर्बरता आधुनिक जीवन में एक नए इरादे और नए हमले से लौट आई है। स्त्रियों का बलात्कार एक बहुत गहरी और साजिश भरी पॉलिटिकल मुहिम है। इसके तार बिखरे हुए हैं। कोई सूत्र किसी से नहीं जुड़ता। एक बढ़ती हुई बिरादरी को खामोश करने की उसे एक तय घेरेबंदी में रहने की नसीहत देने वाली पॉलिटिक्स है ये। वर्चस्ववादियों ने एक नई कॉलोनी बना दी है। वहां पूंजी की परिक्रमा करते हुए स्त्री और पुरुष हैं। उनकी हम बात नहीं करते। उन्हें और घूमना और चक्कर काटना है। लेकिन खतरनाक ये है कि उनकी फेंकी कुछ रौनकें बाकी समाज में छिटक जाती हैं। उनका उत्पात बहुआयामी है।ऐसा उस देश में है जो 19वीं सदी के समाज सुधार आंदोलनों की ऊष्मा ग्रहण कर चुका है। कानून कितना कड़ा कर लीजिए, दफ्तर से लेकर खुली सड़क तक गाइडलाइन से लेकर चौकियां दस्ते और सुरक्षा कर दीजिए। रेप को एक सनसनी बनाने वाले बाजार से भी उपकरण ले आइए। एक पिस्तौल निकाल लीजिए, इत्र, मिर्च और कुछ इसी किस्म की अजीबोगरीब पेशकशें कर लीजिए। लेकिन क्या आपको लगता है ये बलात्कार के विरुद्ध अकेली स्त्री के सबसे उपयोगी हथियार हैं। बार बार बाजार क्यों जाते हो। रेप के विरुद्ध किसी नुस्खे की तलाश में। अपने अंदर क्यों नहीं जाते, समाज और संस्कृति में जो कूड़ा करकट जमा है, उसे क्यों नहीं बीनना शुरू करते। झाड़ झंखाड़ क्यों नहीं साफ करते। आत्मा से गंदगी की सफाई का अभियान क्यों नहीं छेड देते। और ये सब कहने पर कहते हो ये क्या नैतिक तीमारदारी की बात है। सतयुग कलियुग टाइप करते हो। क्या वाकई बहुत अजीब होता है जैसे ही आप इन दिनों आत्मा या नैतिकता की बात करने लगते हैं। इन्हें बस किताबी बातें और आध्यात्म मान लिया गया है। सामाजिक व्यवहार आप कैसे बदलते हैं। डंडे और बंदूक और फांसी के दम पर? क्या इनके खौफ से बलात्कारी घर बैठ जाते हैं। क्या उनके भीतर का पशु भाग खड़ा होता है। वे मनुष्य बन जाते हैं? ऐसा नहीं होता। खूंखारी ऐसे नहीं मरती। एक बहुत ही लंबी और अलग किस्म की लड़ाई चाहिए। एक विराट अलख जगाने का कोई देशव्यापी कार्यक्रम। कोई एक ऐसा आलोडऩ चाहिए, ऐसा एक मूवमेंट और मॉमेंटम जहां हर कोई उठे और प्रतिरोध की नई चेतना बनाए। छोटे छोटे स्तरों पर ये हुआ है। लोग कर रहे हैं। स्त्री आंदोलन हैं। याद कीजिए मणिपुर की महिलाओं का निर्वस्त्र प्रदर्शन। इरोम शर्मिला को देखिए। देश के अन्य हिस्सों में हमलों और शोषणों से उबर कर आई महिलाओं को देखिए। लेकिन ये बिखरी हुई कहानियां हैं, इन्हें एक जगह एक वेग में लाने की जरूरत अब है। वरना इस समाज में तो आदमी भले रह जाएं, आदमियत नहीं रहेगी।
विदेशी महिलाओं के साथ उत्पीडऩ
हाल के दिनों में भारत में विदेशी महिलाओं के साथ उत्पीडऩ के कई मामले सामने आए हैं। इसी साल पोलैंड की एक महिला ने आरोप लगाया था कि दिल्ली में एक टैक्सी ड्राइवर ने उसे धोखे से नशा करा दिया, जिसके बाद उसके साथ बलात्कार हुआ। हालांकि इस मामले को लेकर कुछ गलतफहमियां भी फैली हैं। पिछले महीने एक विदेशी महिला के बलात्कार के मामले में नेपाल के एक युवक को 20 साल कैद की सजा सुनाई गई है। हिमाचल प्रदेश में 39 साल की अमेरिकी महिला के बलात्कार के मामले में भी पिछली जुलाई में छह लोगों को आजीवन कारावास की सजा हुई है। दिल्ली में 2012 के दिसंबर में एक छात्रा के साथ चलती बस में बलात्कार का मामला सामने आने के बाद भारत सरकार ने बलात्कार के मामलों पर गंभीर कदम उठाए हैं और सख्त कानून बनाए गए हैं। हालांकि इसके बाद भी बलात्कार की घटनाओं में बहुत कमी नहीं आई है।
हर 22 मिनट पर बलात्कार
अपेक्षाकृत अधिक सुरक्षित समझी जाने वाली मुम्बई में पिछले आठ माह में बलात्कार की 237 घटनाएं हो चुकी हैं जिनमें से आठ घटनाएं सामूहिक बलात्कार की थीं। जहां तक पूरे देश का सवाल है, भारत में हर 22 मिनट में एक बलात्कार होता है। संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार प्रमुख नवी पिल्लै का कहना है कि बलात्कार भारत की राष्ट्रीय समस्या है।अक्सर गांवों और कस्बों में होने वाले यौन उत्पीडऩ और बलात्कार की घटनाओं की तो कहीं रिपोर्ट तक नहीं होती और इस तरह वे आधिकारिक आंकड़ों से बाहर रहती हैं। अधिकांश मामलों में पीडि़ता शर्म और संकोच के कारण कुछ बोल ही नहीं पाती और उसे रोकने के पीछे समाज का दबाव भी काम करता है। ऐसे मामलों में अक्सर दोष उसी के सर मढ़ दिया जाता है। जिन मामलों में पीडि़त लड़की हिम्मत दिखाती भी है, उनमें भी उसे न्याय मिलने की राह कांटों से भारी होती है। पिछले कुछ दिनों के भीतर दो ऐसे मामले प्रकाश में आये हैं जिन्होंने इस समस्या से सरोकार रखने वालों की नींद तो उड़ा ही दी है, साथ ही यह भी उजागर कर दिया है कि समाज के प्रभावशाली वर्ग के सदस्यों के दुष्कर्मों का पर्दाफाश करना कितना मुश्किल है।
एक सामाजिक परेशानी
यौन उत्पीडऩ का संबंध सत्ता और अधिकार से है और बलात्कार इसका चरम रूप है। यौन उत्पीडऩ की घटनाएं शक्ति प्रदर्शन के प्रयास से पैदा होती हैं और इनमें दूसरे पक्ष की इच्छा या सहमति को कोई महत्व नहीं दिया जाता। अक्सर इनमें एक पक्ष ताकतवर और दूसरा कमजोर होता है। यह शक्ति शारीरिक भी हो सकती है और आर्थिक एवं सामाजिक भी। यह दूसरे के अस्तित्व को नकारने और उसे कुचलने का भी प्रयास है। इसलिए आपसी रंजिश का बदला लेने और जातीय एवं सांप्रदायिक हिंसा की घटनाओं में भी बलात्कार का सहारा लिया जाता है। जो लोग यह मानते हैं कि महिलाएं पश्चिमी वस्त्र पहन कर पुरुषों को आकर्षित करती हैं और एक अर्थ में स्वयं ही यौन उत्पीडऩ को आमंत्रित करती हैं, उन्हें इस सच्चाई को देखना चाहिए कि भारत में बलात्कार की शिकार होने वाली अधिकांश महिलाएं पारंपरिक वस्त्र ही पहनती हैं और यौन उत्पीडऩ का संबंध सत्ता विमर्श से है, वस्त्रों से नहीं। इसलिए तरुण तेजपाल, आसाराम बापू और न्यायमूर्ति गांगुली के मामले अत्यधिक महत्वपूर्ण हैं क्योंकि इनसे पता चलेगा कि भारतीय न्यायव्यवस्था प्रभावशाली लोगों को सजा देने में सक्षम है या नहीं।
पंचायत ने दिया रेप का आदेश
कागजों पर विकास के गगनचुंबी दावों और अंतरराष्ट्रीय बिरादरी को पीछे छोड़ देने की होड़ के बीच भारत में एक गांव की परिषद ने सजा के तौर पर दर्जन भर लोगों को युवती का बलात्कार करने का आदेश दिया।मामला वही पुराना है। 20 साल की लड़की किसी और जाति के लड़के से प्रेम करती थी और मंगलवार रात दोनों को एक साथ बैठे देख लिया गया। आपाधापी में चार लोगों की पंचायत बैठी। उन्होंने तय किया कि लड़की वालों को 25,000 रुपये का जुर्माना देना होगा। पुलिस के मुताबिक जब परिवार वालों ने कहा कि उनके पास पैसे नहीं हैं तो जुर्माना बलात्कार की कीमत पर वसूला गया। पुलिस ने 12 लोगों को गिरफ्तार किया है।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

Thursday, May 16, 2013

Who wants to stop Rape??????







Friends
नारी की बात आप छोड़ ही दो।लोगो ने तो उसे सिर्फ इस्तेमाल की वस्तु ही समझा है।उसे काबू में रखने ,गुलाम बनाये रखने के लिए तो सभ्य समाज के लोगो ने न जाने कितने आडम्बर और नियम बना रखे है। जन्म लेने से लेकर मरने तक निरंतर कार्यरत रहना। जन्म हुआ तो घर में भेदभाव का शिकार। अच्छा खाने पर ही रोक। यदि आवाज निकाली तो प्रताड़ना की शिकार। यानि यातना भरी शुरुआत। थोड़ी बड़ी हुई नहीं की नन्ही सी बच्ची के कंधो पर घर के काम का बोझ ,छोटे भाई को  सँभालने का बोझ।फिर पढाई से बंचित ताकि उसे अपने बारे में जानने का मोका न मिले ,मतलब अपनी   पहचान  से बंचित। 
किसी तरह थोड़ी और बड़ी हुई तो और बेचारी बना दी जाती  है।वो CONFUSE हो के रह जाती है की वो जिन्दा इंसान है भी  की नहीं, या की निर्जीव है ।
फिर वो उस अवस्था में  पहुँच जाती है मतलब मासिक आना शुरू हो जाना।प्रताड़ित होते  हुए भी ,जो सभ्य समाज इसपर जुल्म ढाता है उसे इस दुनिया में लाने की जिम्मेवारी।मुझे यहाँ एक बात पर बड़ी हैरानी होती है वो ये की जब मासिक आना शुरू होता है तो घर के लोगो को जहाँ उस लड़की का सम्मान करना चाहिए वही उसे मासिक के अंत होने तक उससे एक अछूत की तरह व्यवहार किया जाता है जैसे की उससे बहुत बड़ा अपराध हो गया है। उसे घर के किसी भी शुभ कार्य में भागिरदार बनने का हक़ नहीं होता।जिस लड़की के द्वारा इस सभ्य समाज का वंश फलता  फूलता है उसके साथ ऐसा व्यवहार ! साथ ही मुझे इस बात को भी आपके बिच उठाना है सबसे ज्यादा  भूखे  प्यासे रहकर धार्मिक कार्यो में व्यस्त रहती है उसे ही धार्मिक कार्यो /धार्मिक स्थलों से दूर रखा जाता है।जरा सोचिये,विचार कीजिये।
धार्मिक अनुष्ठान में कुवारी कन्या को बहुत महत्व दिया जाता लेकिन उसी कन्या को दुनिया में आने के  लिए कैसे कैसे दौर से गुजरना पड़ता है।
खैर मेरे दिल में बहुत भड़ास है ,उसे जाने दीजिये। अभी का मुद्दा यहाँ हो रहे  बलात्कार  पर चर्चा SHORT में करता हु। 
आज जब स्त्री अपने पैरो पे खड़ी होने लगी हैं ,अपना अच्छा -बुरा सोचने समझाने लगी हैं , पैसे से मजबूत हो रही हैं ,बराबरी कर रही हैं तो सभ्य समाज के लोगो को नागवार गुजर रहा है।इसलिए स्त्री को कैसे डराया  जाए ,धमकाया जाय ,आगे बढ़ने से रोका जाय।तो निम्न  तरह की घटना शुरू हो जाती है जैसे :-
बलात्कार ,     तेजाब फेकना ,    एक तरफ़ा प्यार में जान ले लेना ,   MMS बना कर फैलाना ,  घर में जला देना ,   इज्जत के नाम पर स्त्री की बलि चढ़ाना,   वेश्यावृति में धकेलना ,    डायन बना देना   तथा   अन्य दुसरे तरीके से  दहशत फैलाना।इसके अलावा समय समय पर तुगलकी फरमान :--
 @ कोई कहता है उनका पहनावा दोषी है। स्कर्ट/ जिन्स  पर रोक  लगावो।कोई GUARANTI दे सकता है 
     की बुरका पहनने पर कुछ नहीं होगा। 
@ कोई कहता है तिरछी नजर से देखेगी तो उत्पीडन तो होगा ही।
@ कोई कहता है घर से बेवक्त निकलेगी तो घटना होगी ही।जिस घर में पुरुस नहीं है वहा तो महिला को       ही     EMERGENCY में  निकलना पड़ेगा।   
@ कोई कहता है INTERNET ,TV दोषी है।यानि अपनी कामिओ को किसी और पे थोपो।
@  कोई कहता है   SEX-EDUCATION  देना चाहिए। 
@ अन्य बहुत तरह के  बेफिजूल की बात। 
मुझे ऐसे लोगो से ये  जानना है की ये लोग  आसमान से टपके है या इसी धरती पर पैदा हुए  हैं।अपने से पैदा हुए हैं या किसी माँ के कोख से ही पैदा हुए हैं।ऐसे विचार के लोग न ही अपने परिवार की महिला (माँ,बहन ,बेटी,बहु,अन्य  )  के  सगे हो सकते हैं ना  ही बाहर की महिलावो के।ऐसे लोगो के लिए महिला सिर्फ और सिर्फ वासना की विषय-वस्तु है , उनके पैर की जूती है।
हमने  आजतक महिलावों की ओर से तो पुरुषों के बारे में कोई टीका -टिपणी नहीं आयी।चाहे आप घर में नंगे घुमो या कही भी पेशाव करने लगो , ADULT MOVIE देखो  ,दारू पीकर सरेआम नौटंकी करो /ABUSE करो।
पहनावा किसी भी इन्सान   का निजी मामला है  और  किसी को बोलने का कोई अधिकार नहीं है। अगर बोलना है तो लड़का लड़की में बिना कोई भेद किये बोलना होगा। फालतू में ठेकेदार बनने की जरुरत नहीं।
TV ,INTERNET  सभी इन्सान की भलाई के लिए बने है। ये तो इन्सान के ऊपर है की उसका उपयोग वो कैसे करता है। आग , गैस , पेट्रोल , बिजली , तथा अन्य अविष्कार इन्सान की भलाई के लिए बने है ।ये तो इंसानों के ऊपर की उनका इस्तेमाल वो उर्जा  के लिए करते हैं की अपने घर की  बहु को जलाने के लिए करते हैं।कुछ लोग  SEX-EDUCATION की वकालत करते हैं।ये वो ही लोग हैं जो ये चाहते हैं की महिला का पूरी तरह से भोग की वस्तु  बना दी जाये। हमारे CULTURE में माँ-बाप के अलावे अन्य बड़ो को चाहे वो स्त्री-पुरुस कोई   भी हो उनके पैर छूकर सम्मान देने की परंपरा है।इस वजह से अभी भी समाज में थोड़ी बहुत DECIPLINE बाकि है।लेकिन ये लोग HI - BYE की SOCIETY DEVELOP करना चाहते हैं।TIME TO TIME ,SEX सर्वे करा कर महिला-पुरुस के निजी और नाजुक मसलो को प्रचारित किया जाता है।इसके कितने परिणाम   भयावह हो सकते हैं ,समाज उसे झेल नहीं पायेगा।
आज हकीकत में कोई  नहीं चाहता की महिला उत्पीडन बंद हो,बलात्कार बंद हो ,अन्य घटना बंद हो।सिर्फ दिखावा करते हैं।कोई घटना हुई नहीं की CANDLE जला कर निकल पड़े शहर बंद करने।एक उत्पीडन पहले से और बंद के बाद गरीबों की रोजी-रोटी बर्बाद कर  दूसरा उत्पीडन।  कैंडल जलाया ,थोडा घुमे ,शहर बंद कराया ,टायर जलाये  फिर अपने-अपने घरो में जाकर सो गए ताकि फिर कोई बलात्कार,महिला उत्पीडन  की घटना हो तो वो CANDLE जलाकर अपना धर्म निभाए।सिर्फ और सिर्फ राजनीति ,MEDIA में फोटो खिचाने ,अपनी थोड़ी पहचान बनाने के लिए ।
सरस्वती पूजा या अन्य पूजा में इतने गंदे -गंदे गाने  बजाये जाते हैं ,धर्म की आड में महिला से छेड्छार ,उत्पीडन किया जाता है तब ये सभ्य समाज कहा रहता है।उनका तो MIND SET है | एक लड़का ,लड़की छेड़े तो कुछ नहीं लेकिन लड़की सिर्फ नजर भी उठा दे तो उसके पुरे चरित्र का चित्रण किया जाता है।मुझे तो और भी बहुत  कुछ कहना है लेकिन उससे क्या होगा।अब समय है कुछ करने का।मैं सिर्फ इतना जानता  हूँ कि  # माँ,  # स्त्री ,  # पृथ्वी ,  # नदी  का यदि सम्मान नहीं करोगे तो  समाज का अस्तित्व ही मिट जायेगा।शुरुआत हो चुकी है लेकिन नासमझ इन्सान अपनी हरकतों से बाज  नहीं आ रहा।जिस  पेड़ के डाल पर बैठा है  उसे ही काट  रहा है।सिर्फ सोचिये,विचार कीजिये।  क्यूकि हमाम में सभी नंगे हैं 
रोज हो रहे इस तरह की महिला उत्पीडन की घटनावों से मैं बहुत आहत होता हूँ।लगता है  जैसे पुरुसो के द्वारा महिलावो के खिलाफ एक जंग हो रही है।इन्सान की उत्पत्ति जहा से हुई उसे ही मिटाने  पर तुला है। 
मैं चाहता हूँ की कुछ ऐसा करूँ की महिलावों का सम्मान  बढ़ें ,महिला उत्पीडन की घटनावों पर लगाम लगे।मैंने सारी PLANING  भी कर राखी है लेकिन  FUND  की कमी की वजह से उसे IMPLEMENT करने में दिक्कत हो रही है।आज की मतलबी दुनिया में उम्मीद भी किससे करे। सभी अपने ऐसो-आराम जुटाने में व्यस्त हैं।कोई तभी आगे आयेगा जब उनके घर में कोई बड़ी घटना होगी।वो भी आगे आएंगे लेकिन सिर्फ CANDLE जलाने के लिए।
और यदि आप हकीकत में साथ देना चाहते हैं तो पुरे मन से निःसंकोच अपना सहयोग दें।आपसे सहयोग की अपेछा है। यदि मेरे पास अपने इस  Project / Plan  के लिए फण्ड होता तो शायद मैं किसी से सहयोग नहीं लेता।। बहुत बड़ी बात तो नहीं लेकिन कुछ अच्छा और FAST रिजल्ट  तो निकल ही लूँगा।मुझे भी दुनिया छोड़ने के समय शुकून रहेगा की चलो कुछ अच्छा कर के जा रहा हूँ। 
Thanks
Regards
Prabhat Ranjan
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