Monday, February 24, 2014

महिलाओं का रिमोट कंट्रोल


जब से नारी जाति में शिक्षा के प्रति जागरूकता आई है और उसने अपने मुबारक कदम अपनी घर की दहलीज से बाहर  निकाले है उसके बाद से ही उसका ज्यादातर रिमोट पुरुषों ने अपने हाथ में रखने की कोशिश की है तो किन्ही विशेष परिस्थितियों में उसने खुद ही पुरुषों के हाथ में चाहे और अनचाहे , अनजाने में ही अपना रिमोट सिस्टम सौंप दिया है …..
अपने नम्बर बढ़वाने + पास करवाने की ऐवज में  कभी भूले भटके वोह खुद ही , और  ज्यादातर मामलों में जबरन उसका रिमोट कलियुगी शिक्षकों द्वारा अपने हाथ में ले लिया जाता है ….. उसके बाद नौकरी का नियुक्ति पत्र पाने + तरक्की पाने के लिए भी महिलाए अपना रिमोट पुरुषों के हाथ में स्वेच्छा से देती रही है ….. रिशेप्शनिस्ट तथा पर्सनल सेक्रटरी की पोस्ट पर कार्यरत महिलाओं से तो यह आशा हर हाल में की ही जाती है + रखी जाती है की वोह अपने बॉस के रंग में रंग कर उसकी  चहेती बन कर दिखलाये …..
महिलाएं किसी भी क्षेत्र में चली जाए बस उनसे एक ही आशा रखी जाती  है और बस एक ही अपेक्षा की जाती  है ….. महिलाए किसी भी जगह पर सुरक्षित नहीं है यहाँ तक की धार्मिक स्थलों पर भी धर्म के ठेकेदारों ने धार्मिक स्थलो की मान मर्यादा को बार बार भंग किया है तथा वहां पर भी औरतों की इज्जत को तार तार किया है ….. दुःख की बात है की किसी भी धर्म के धार्मिक स्थान इन कामो से अछूते  नहीं है , और आजकल के आधुनिक ढ़ोंगी और पाखण्डी बाबाओं के तो कहने ही क्या ?….. शिकायत मिलने पर इनके डेरों से अक्सर ही छापामारी में अश्लील सामग्री  के साथ साथ लड़किया मिल जाती  है जिनकी आत्मा तक का कंट्रोल स्वामी जी के हाथ में पकडे अद्रश्य रिमोट में समाया होता है …..
और अगर  राजनीति की बात करे तो इसके बारे में एक बड़ी ही मशहूर कहावत है की "लुच्चा लफंगा चौधरी और बदनाम औरत प्रधान" ….. इस क्षेत्र में कोई विरली ही महिला होगी जिसका की रिमोट किसी नेता के हाथ में ना हो …. आप सोचते होंगे की सब कुछ पता होते हुए भी औरते इस क्षेत्र में अपनी किस्मत क्यों आजमाती है ….. इस फील्ड  में पैसा + शोहरत और सत्ता का आकर्षण इनको अपनी तरफ खींचता है ….. लेकिन अपने अकेली के बलबूते भी शायद ही किसी ने राजनीती में प्रवेश किया हो + पैर रख कर अपना मुकाम बनाया हो ममता दीदी की तरह ….. उनको शुरुआत में या फिर बाद में किसी ना किसी पुरुष का सहारा लेना ही पड़ता है कुमारी जयललिता और कुमारी मायावती की तरह ….. और इस फील्ड के यह घाघ नेता इनका क्या हश्र करते है यह खुद इनके इलावा कोई भी नहीं जानता …..
राजनीति के बाद बात आती है माडलिंग तथा फ़िल्मों से जुड़े हुए  क्षेत्र की ….. इसमें नारी कितनी सुरक्षित है यह किसी से कहने या बताने की जरूरत नहीं है ….. लेकिन यहाँ पर उसका रिमोट अलग अलग समय में अलग -२ पुरुषों के हाथो में बदलता रहता है ….. बड़े पर्दे पर दिखने की चाहत  की बात तो रहने दीजिए हमारे बुद्धू बक्से में प्रसारित होने वाले धारावाहिकों में भी रोल देने के नाम पर पर्दे के पीछे बहुत कुछ होता है …..
इसके बाद बारी आती है जबरन वैश्याव्रती के धन्धे में धकेल दी  गई महिलायों की …. अपने पिछले जन्म के पापों की सज़ा भुगत रही उन बेचारियों के एक ही समय में अनेको हाथों में रिमोट कंट्रोल रहते है जैसे की कोठे वाली बाई और दलाल वगैरह तथा इस पेशे से जुड़े हुए गुंडों के हाथों में …. लेकिन आजकल की  आधुनिक हाई फाई सोसाइटी की देन  कालगर्ल देखने में चाहे अपनी मर्जी से इस धन्धे में आई हुई दिखती हो लेकिन असल में उसका रिमोट भी किसी ना किसी रूप में किसी पुरुष के हाथ में ही होता है ……
और सबसे ज्यादा दुःख तो तब होता है जब मै इस प्रकार की खबरों को  की शादी / नौकरी  का झांसा देकर शारीरिक शोषण / बलात्कार  करता रहा" )

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खाने के बदले विदेशियों ने बनाई न्यूड फिल्म!  
रोहतक के प्रोटेक्शन होम में महिलाओं के यौन शोषण का सनसनीखेज खुलासा हुआ। प्रोटेक्शन होम में रहने वाली महिलाओं ने आरोप लगाया है कि अक्सर यहां विदेशी नागरिक आते थे और उनकी नंगी तस्वीरें उतारते थे।महिलाओं की ओर से लगाए गए आरोप गंभीर हैं लेकिन केस दर्ज करने के लिए पुख्ता सबूतों की जरूरत है।

"एनजीओ भारत विकास संघ" प्रोटेक्शन होम का संचालन करता है। मई में बाल कल्याण संरक्षण के राष्ट्रीय आयोग ने एनजीओ के दफ्तर पर छापा मारा था। एनसीपीसीआर ने 9 मई को प्रोटेक्शन होम से 10 से 15 की उम्र के 90 नाबालिक को छुड़ाया था। होम की मालकिन जसवंती देवी पर इममोरल ट्रैफिकिंग,प्रताड़ना और बंधुआ मजदूरी को प्रोत्साहित करने का केस दर्ज किया गया था।

हरियाणा और पंजाब हाईकोर्ट की ओर से गठित चार सदस्यीय टीम के सामने महिलाओं ने बताया कि मुंबई से आए विदेशी नागरिकों ने उनकी नंगी तस्वीरें उतारी थी। उन्होंने अच्छा खाना और अच्छे कपड़े देने का लालच देकर नंगी फिल्में उतारी थी। जसवंती देवी का दामाद जय भगवान लड़कियों को विदेशियों के आने से पहले सूचित करता था। विदेशी मेहमानों की यहां खूब आवभगत होती थी।

ये खुलासे चौंकाने वाले हैं। जांच रिपोर्ट कोर्ट के सामने पेश किए जाने के बाद ही पूरे मामले से पर्दा हटेगा। अगर मामले की जांच हरियाणा से बाहर की किसी स्वतंत्र एजेंसी से कराई जाती तो पीडितों को न्याय मिलने की ज्यादा गुंजाइश है।

सूत्रों के मुताबिक विदेशी लोगों के खिलाफ आरोपों की बात जसवंती देवी से पूछताछ के दौरान भी सामने आई थी। हरियाणा पुलिस ने बुधवार को तीन सदस्यीय एसआईटी का गठन किया है जो पुलिसकर्मियों द्वारा यौन शोषण के आरोपों की जांच करेगी।

आरोप है कि प्रोटेक्शन होम में रहने वाली लड़कियों को चंडीगढ़ में आला अधिकारियों के यहां होने वाली आलीशान बर्थडे पार्टियों में ले जाया जाता था। 18 साल से अधिक उम्र की लड़कियों को पैसे लेकर उम्र दराज लोगों से जबरन शादियां करा दी जाती थीं।
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अजूबा: 84 साल की महिला के पेट में 44 साल का बच्चा!



ब्राजील। सामान्य महिला का गर्भकाल 9 महीने का होता है। कई बार ये कम भी हो सकता है और एक-दो दिन आगे भी। लेकिन ब्राजील में 84 वर्ष की महिला के गर्भ में 44 साल स्टोन बेबी है।
कुछ दिन पहले डॉक्टरों ने इस महिला का एक्स-रे किया जिसके बाद पता चला कि महिला के गर्भ में अविकसित मृत भ्रूण है। दरअसल, ये महिला 40 साल पहले गर्भवती हुई थी, उस दौरान ली गई दवाओं की वजह से बच्चा गर्भ में मर गया था। जिसके कारण इस महिला के पेट में तेज दर्द हुआ करता था। इसका इलाज करने महिला टोकांटिस स्टेट के नैतिविदाद अस्पताल गई थी। जब इस महिला का एक्स-रे किया गया तो उन्हें इस महिला के पेट में 20 से 28 हफ्ते का स्टोन बेबी मिला। जिसके बाद उसे पोर्टो नेकिनोल अस्पताल में शिफ्ट कर दिया गया।
महिला ने डॉक्टरों को बताया कि वो करीब 44 साल पहले गर्भवती हुई थी। महिला ने बताया कि उसने एसी ही शिकायत पहले भी की थी लेकिन गांव में कोई अच्छा अस्पताल न होने की वजह से बीमारी का पता नहीं चल सका। वहां उसे दवा दे दी जाती थी जिसके बाद उसे कुछ राहत हो जाती थी।
डेली मेल के अनुसार, जब महिला का एक्स-रे किया गया तो उन्हें स्टोन बेबी का पता चला। बच्चे का मुंह साफ समझ आ रहा था। हालांकि डॉक्टर अभी इसे सर्जरी से बाहर निकालने पर विचार कर रहे हैं लेकिन उनका कहना है कि ये आश्चर्य चकित करने वाला है।



नौ साल की बच्ची ने पढी 364 किताबें सिर्फ सात महीनों में

नौ साल की बच्ची ने पढी 364 किताबें सिर्फ सात महीनों में
 एक नौ साल की लडकी ने ऎसा काम कीया जिसे आप सुनकर हैरान हो जायेंगे। आपको पता है इस नौ साल की छोटी सी लडकी ने सिर्फ सात महीनों में ही 364 किताबें पढ चुकी है क्यों चौक गये न आप लेकिन ऎसा ही कुछ एक लडकी ने कर दिखाया है। रिपोर्ट के अनुसार, चेशायर के एश्ले में रहने वाली फेथ जैक्शन खुद को टेलीविजन कंप्यूटर गेम से दूर रखती है। वह इनकी जगह रोआल्ड दाल्ह या हैरी पॉटर को पढना ज्यादा पसंद करती है। उसे किताबों से बेहद लगाव है। जब वह प्राइमरी स्कूल में थी तब शिक्षकों द्वारा प्रोत्साहित किए जाने पर उसमें किताबों के प्रति प्रेम बढा। फेथ की मां ने कहा कि वह कहती है कि उसे टीवी या कंप्टूटर गेम की तरह ही किताबों को पढने में बेहद मजा आता है।

 फेथ ने कहा कि उसे सबसे ज्यादा जानवरों या जादू या रोमांच की किताबें पसंद हैं। साथ ही यह भी कहती है कि लेकिन मेरी दुनिया सिर्फ किताबों तक ही सीमित नहीं है। मैं सप्ताह में चार घंटे जिम्नास्टिक करती हूं। इसके अलावा कराटे क्लासेस जाती हूं, नेटबॉल खेलती हूं और ड्रम बजाना सीख रही हूं। तो देखा आपने इतने सारे टेलेंट एक छोटी सी वो भी सिर्फ नौं साल की लडकी में देखने को मिला है। शायद किसी भी और बच्चो में ये देखने को मिले।

कहां जा रहे हैं ये बच्चे

भारत में बच्चे खबर नहीं बनते.. बच्चों की छिटपुट खबरें आती हैं, यौन हिंसा या दुष्कर्म का शिकार होने पर। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के अनुसार हर आठ मिनट में एक बच्चा गायब हो रहा है। आखिर ये कौन-सा जाल है जहां फंस रहा है मासूम जीवन ?

सन् 2011 में भारत में 90 हजार बच्चे गायब हुए। इनमें आधे से ज्यादा केस आज भी अनसुलझे हैं। सिर्फ 15 हजार मामलों में खोजबीन हुई। भूकंप, बाढ़, सुनामी आदि प्राकृतिक विपदाओं के बाद बेघर हुए बच्चों पर भी राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय बाल माफियाओं की गिद्ध दृष्टि बनी रहती है! यूएस के स्वास्थ्य और मानव सेवा विभाग के अनुसार 6 से 8 लाख लोग सालाना दुनिया भर में मानव व्यापार में धकेले जाते हैं, जिनमें से 14500-17500 पीड़ित अकेले यूएस में भेजे जाते हैं। दुनियाभर के इन पीड़ितों में आधे से ज्यादा बच्चे हैं! फीनिक्स आज के समय में बच्चों की किडनैपिंग राजधानी है। विशेषज्ञों का मानना है कि किडनैप किए गए ये बच्चे पूरी दुनिया में 'सेक्स टॉय' के नाम पर भेजे जाते हैं! पूरी दुनिया में तकरीबन 20 लाख बच्चे यौन गुलामी करने को मजबूर हैं। जाहिर है उनमें भारतीय बच्चे भी हैं। कुछ समय पहले 'एकपैट इटालिया' नाम की समाचार एजेंसी ने खुलासा किया है कि दुनियाभर में हर दो मिनट में एक बच्चा यौन शोषण का शिकार होता है। अध्ययन रिपोर्ट में कहा गया है कि बाल वेश्यावृत्ति, बाल यौन पर्यटन, बाल अश्लीलता और यौन शोषण के लिए बच्चों की तस्करी अब पुरानी बातें हो चुकी हैं। इन दिनों गरीब विकासशील राष्ट्र, यहां तक कि 

इटली जैसे संपन्न राष्ट्र 'सेक्स टॉय' के रूप में बच्चों की तस्करी के लिए उपयुक्त बाजार बन रहे हैं। इसी एजेंसी की रिपोर्ट के अनुसार हर साल हजारों पर्यटक बच्चों के साथ यौन संबंध बनाने के लिए विदेश यात्रा करते हैं! भारत में इस तरह का कोई अध्ययन न होने के कारण यह साबित नहीं होता कि हम दूध के धुले हैं।

 

भारत बाल वेश्यावृत्ति के लिए एक स्रोत भी है और गंतव्य भी। एक अनुमान के मुताबिक हर साल 12 से 50 हजार स्त्रियां और बच्चे नेपाल और बांग्लादेश जैसे पड़ोसी देशों से वेश्यावृत्ति के लिए भारत लाए जाते हैं। महिला एवं बाल विकास मंत्रालय के अनुसार वेश्यावृत्ति के व्यापार में 40 प्रतिशत बच्चे हैं। छोटी लड़कियों की मांग बढ़ रही है, छोटे लड़के भी इससे अछूते नहीं हैं। भारत में जो पर्यटन उद्योग फल-फूल रहा है उसके पीछे बाल वेश्यावृत्ति भी एक प्रमुख कारण है। न सिर्फ भारत में, बल्कि पूरी दुनिया के बच्चे भयानक यौन शोषण के शिकार हो रहे हैं।असल में पूरी दुनिया में जो यौन उन्माद बढ़ा है उसने न सिर्फ स्त्रियों को 'यौन वस्तु' में तब्दील किया है, बल्कि बच्चों को भी 'सेक्स टॉय' के रूप में देखने/भोगने के घिनौने चलन को बढ़ाया है। कुछ चीजें ऐसी भी हैं, जो प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से बच्चों को स्वयं ही सेक्स उद्योग के लिए खुद को तैयार करने के लिए उकसा रही हैं। छोटे बच्चों के लिए होने वाली 'सौंदर्य प्रतियोगिताएं' बच्चों, खासतौर से लड़कियों को 'सेक्सुअलाइज' करती हैं। बाल मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि ऐसी प्रतियोगिताएं लड़कियों के दिमाग में बैठा देती हैं कि सुंदर दिखना ही उनकी जिंदगी का सबसे बड़ा लक्ष्य है। चेहरे पर मेकअप की मोटी परत और चेहरे पर युवा होने जैसे भाव, ये सारी चीजें उनके दिमाग पर अनावश्यक दबाव बनाती हैं। बच्चे स्वेच्छा से अपनी मासूमियत और बचपना खोकर समय से पहले युवा दिखना और महसूस करना चाहते हैं। स्वयं मां-बाप बच्चों को इन चीजों के लिए तैयार करते हैं। अपनी दबी हुई या अधूरी इच्छाओं को वे बच्चों पर लादते हैं। फैशन शो या सौंदर्य प्रतियोगिताओं में भाग लेना बच्चों के लिए वैसा ही खतरनाक है जैसे छोटी उम्र में मां बनना!

 घरों के भीतर होने वाले यौन शोषण को मां-बाप काफी हद तक अपने स्तर पर रोक सकते हैं। बच्चों का ज्यादा ध्यान रखकर, उनकी बातों पर यकीन करके, उन्हें ऐसी घटनाओं की जानकारी देकर, चौकन्ना रहने की सीख देकर। लेकिन बड़े पैमाने पर हो रहे बाल यौन अपराधों को सरकार और पूरी व्यवस्था की ईमानदारी के बिना रोकना असंभव है। हालांकि बच्चों की यौन हमलों से सुरक्षा संबंधी एक बिल 2012 में पास किया गया है, लेकिन आशंका यही है कि इस बिल का भी वही हश्र होगा जो कि बाकी कानूनों का हो रहा है। कुछ समय पहले सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि बाल यौन शोषण के मामले में चुप्पी एक जुर्म है। यदि बच्चों के यौन शोषण की जानकारी होने पर भी पुलिस को सूचित नहीं किया जाता, तो यह एक गंभीर अपराध है। इस संबंध में केंद्र व राज्य सरकारों को स्पेशल जुवेनाइल पुलिस यूनिट की स्थापना के आदेश भी दिए गए हैं ताकि पीड़ित बच्चों की सुरक्षा और संबंधित कार्रवाई जल्दी हो सके। 

 निराश करने वाला सच यह है कि निकट भविष्य में बाल यौन शोषण के और ज्यादा बढ़ने की संभावना है। अभी तक तो इस खौफनाक सच को खुलकर स्वीकार करने में ही सांस फूल रही है। फिर ऐसे में मर्ज की दवा भला कैसे हो सकती है? बस अपने बच्चों का हाथ कसकर पकड़े रहिए, उनको चौकन्ना रखिए और उन पर विश्वास कीजिए। सावधान रहिए शिकारी हर तरफ घात लगाए बैठे हैं। इंसान अपने बच्चे के लिए बहुत कुछ खरीद सकता है, पर बचपन नहीं खरीद सकता। किसी भी कीमत पर नहीं। जितना स्वस्थ बचपन होगा भावी समाज की नींव उतनी ही मजबूत होगी। 

दाढ़ी वाली महिला: मुझे ख़ुद से प्यार है

हरनाम कौर, दाढ़ी वाली महिला
 हरनाम कौर 23 साल की हैं. हरनाम कौर को  है जिसकी वजह से बालों का अतिरिक्त विकास होने लगता है. लेकिन वो पिछले सात सालों से चेहरे के बालों को बढ़ने दे रही हैं.
वो कहती हैं, "मैं एक आम औरत की तरह नहीं दिखना चाहती."
लेकिन हरनाम का नज़रिया हमेशा इतना सकारात्मक नहीं था.
जब वो 11 साल की थीं तो उनके चेहरे पर बाल आने शुरू हो गए. धीरे-धीरे उनके सीने और बांहों पर भी बाल आने शुरू हो गए.
इसकी वजह से उन्हें लोगों के दुर्व्यवहार का सामना करना पड़ता था.
वो बताती हैं, "बारहवीं तक मेरे साथ हमेशा ही दुर्व्यवहार होता था. यह बहुत डरावना था. मुझे सुबह उठने से डर लगता था."
'मैं क़ैद में थी'
"जब मैं किशोरी थी तब पत्रिकाओं और टीवी पर ख़ूबसूरत औरतों को देखकर मैं भी उनके जैसी दिखना चाहती थी."
हरनाम कौर
अपनी किशोरावस्था के दिनों में हरनाम अपनी दाढ़ी को लेकर इतनी शर्मिंदा रहती थीं कि वो हफ़्ते में दो बार वैक्सिंग करती थीं. उन्होंने ब्लिचिंग और शेविंग करने की भी कोशिश की.
वो बताती हैं कि इससे उनकी समस्या और बढ़ गई. इससे बाल मोटे होने लगे और शरीर के दूसरे हिस्सों में भी फैलने लगे.
14 साल की उम्र तक वो अपने आपको लेकर इतने संवेदनशील हो गईं कि उन्होंने घर से निकलना छोड़ दिया. वो खुद को नुकसान पहुंचाने यहां तक कि आत्महत्या के बारे में भी सोचने लगी थीं.
वे कहती हैं, "मैं अपने बेडरूम में क़ैद हो गई थी. मैं हमेशा वहीं रहती थी. यह सब तक़रीबन एक साल तक चला. फिर मुझे लगा कि इससे कोई फ़ायदा नहीं होने वाला. खुद को नुकसान पहुंचाने से फ़ायदा होने के बजाय मुझे काफ़ी भावनात्मक चोट पहुंची."
हरनाम बताती हैं, "मुझे लगता है कि जब तक कोई उस स्थिति में न हो जिसमें दूसरा है, तब तक वो उसकी बात नहीं समझ सकता."
वो कहती हैं, "जब मैं किशोरी थी तब पत्रिकाओं और टीवी पर ख़ूबसूरत औरतों को देखकर मैं भी उनके जैसी दिखना चाहती थी."
वो कहती हैं, "यह एक बहुत भयावह अनुभव था कि मेरी हर दोस्त का बॉयफ़्रेंड था लेकिन मुझे कोई पसंद नहीं करता था."
'मैं खिल गई हूं'
"मेरा आत्म-विश्वास बढ़ने के बाद मैं नए लोगों से मिलने-जुलने में ज़्यादा सहज हो गई हूं."
हरनाम कौर
हरनाम को उनके छोटे भाई और उनके दोस्तों से काफ़ी मदद मिली और उन्होंने 16 की उम्र में सिख धर्म में दीक्षित होने के बाद से रेज़र का इस्तेमाल करना छोड़ दिया.
वो कहती हैं, "मैंने बालों के साथ ख़ुद को स्वीकार करने के लिए लंबी लड़ाई लड़ी है. मैंने आखिरकार अपना प्राकृतिक स्वरूप पा लिया."
वे कहती हैं, "मैं अभी भी तक़रीबन एक महीने या उसके बाद बाल बनाती हूँ. लेकिन अब मैं दाढ़ी बढ़ाने का आध्यात्मिक महत्व समझ चुकी हूं. यह समझने के बाद ही शायद मैंने सोचा कि अब मैं यह नहीं करूंगी. मैं अपना रेज़र फेंक दूंगी."
वे कहती हैं कि उनके धर्म ने उन्हें बहुत आत्मविश्वास दिया है.
वे कहती हैं, "मुझे लगता है कि आखिर मैंने अपना वास्तविक स्वरूप पा लिया है."
वे कहती हैं, "मेरा आत्म-विश्वास बढ़ने के बाद मैं नए लोगों से मिलने-जुलने में ज़्यादा सहज हो गई हूं. मुझे लगता है कि मैं खिल गई हूं."

युवती ने दांतों से काट डाली जबरन चुंबन लेने वाले मनचले की जीभ

भोपाल: किस्सा मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल का है, जहां एक लड़की ने उसे कई दिन से लगातार छेड़ रहे मनचले को जोरदार सबक सिखाया... पुलिस के मुताबिक कमलेश नामक मनचले ने जब सरेआम बीच सड़क पर लड़की को दबोचकर उसका जबरन चुंबन लिया, तो लड़की ने दांतों से उसकी जीभ पर इतनी ज़ोर से काटा कि उसकी जीभ कटकर अलग गिर गई...

भोपाल के कमला नगर थानाक्षेत्र के प्रभारी  बताया कि पीड़ित युवती से कमलेश नामक यह मनचला कई दिनों से छेड़छाड़ कर रहा था, लेकिन बुधवार को उसने सारी हदें पार कर दीं, और अकेली पाकर बीच सड़क पर युवती को दबोचकर उसका चुंबन लेने लगा, तब युवती ने अपने दांतों से उसकी जीभ पर इतनी बुरी तरह काटा कि वह लगभग एक इंच कटकर अलग हो गई...

उन्होंने बताया कि युवती का कहना है कि यह लड़का उससे एकतरफा प्यार करता था और लम्बे समय से आते-जाते उससे छेड़छाड़ करता था... बुधवार दोपहर को जब वह अकेली जा रही थी, तभी उसने बीच सड़क पर उसे बाहों में जकड़कर जबरदस्ती चुंबन लेना शुरू कर दिया... ने बताया कि जब युवती के विरोध करने पर भी आरोपी नहीं माना तो उसने कमलेश की जीभ काट ली...
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Sunday, February 2, 2014

वर्चस्व, वासना और रेप

2014 की ये जनवरी तो मानो हमारी उम्मीदों और सपनों की कम, आशंका और आक्रमण की जनवरी साबित हो रही है। इस एक महीने में पश्चिम बंगाल के वीरभूम से लेकर देश भर में जैसे वहशियों ने नई यातना पॉकेट्स तैयार कर ली हैं। 27 जनवरी नाजी यातना शिविर आउश्वित्ज से मुक्ति की 69वीं सालगिरह है। लेकिन साढ़े छह दशकों बाद हम यातना शिविर पूरी दुनिया में पाते हैं। सबसे ज्यादा महिलाएं निशाने पर हैं। ये शिविर जेहन से लेकर घर, मुहल्ला, शहर, गांव, सड़क सब जगह फैले हैं। 64 साल के गणतंत्र में ये कुत्सित अभियान क्योंकर जारी है, इस पर बोलना तो दूर, हरकत तक नहीं होती। राष्ट्रपति का देश के नाम संदेश इन घृणितों को ललकारता नहीं है। कहीं कुछ नहीं होता। एक भीषण और उबाऊ यथास्थिति पसरी हुई है। और इसी में कुछ एक्शन छिटपुट होता है तो बाजुएं फड़कने लगती हैं, अरे देखो अब क्रांति हुई। कुछ नहीं होता। एक मोमबत्ती भी पूरी नहीं पिघल पाती। इतिहास और सदी की बर्बरता आधुनिक जीवन में एक नए इरादे और नए हमले से लौट आई है। स्त्रियों का बलात्कार एक बहुत गहरी और साजिश भरी पॉलिटिकल मुहिम है। इसके तार बिखरे हुए हैं। कोई सूत्र किसी से नहीं जुड़ता। एक बढ़ती हुई बिरादरी को खामोश करने की उसे एक तय घेरेबंदी में रहने की नसीहत देने वाली पॉलिटिक्स है ये। वर्चस्ववादियों ने एक नई कॉलोनी बना दी है। वहां पूंजी की परिक्रमा करते हुए स्त्री और पुरुष हैं। उनकी हम बात नहीं करते। उन्हें और घूमना और चक्कर काटना है। लेकिन खतरनाक ये है कि उनकी फेंकी कुछ रौनकें बाकी समाज में छिटक जाती हैं। उनका उत्पात बहुआयामी है।ऐसा उस देश में है जो 19वीं सदी के समाज सुधार आंदोलनों की ऊष्मा ग्रहण कर चुका है। कानून कितना कड़ा कर लीजिए, दफ्तर से लेकर खुली सड़क तक गाइडलाइन से लेकर चौकियां दस्ते और सुरक्षा कर दीजिए। रेप को एक सनसनी बनाने वाले बाजार से भी उपकरण ले आइए। एक पिस्तौल निकाल लीजिए, इत्र, मिर्च और कुछ इसी किस्म की अजीबोगरीब पेशकशें कर लीजिए। लेकिन क्या आपको लगता है ये बलात्कार के विरुद्ध अकेली स्त्री के सबसे उपयोगी हथियार हैं। बार बार बाजार क्यों जाते हो। रेप के विरुद्ध किसी नुस्खे की तलाश में। अपने अंदर क्यों नहीं जाते, समाज और संस्कृति में जो कूड़ा करकट जमा है, उसे क्यों नहीं बीनना शुरू करते। झाड़ झंखाड़ क्यों नहीं साफ करते। आत्मा से गंदगी की सफाई का अभियान क्यों नहीं छेड देते। और ये सब कहने पर कहते हो ये क्या नैतिक तीमारदारी की बात है। सतयुग कलियुग टाइप करते हो। क्या वाकई बहुत अजीब होता है जैसे ही आप इन दिनों आत्मा या नैतिकता की बात करने लगते हैं। इन्हें बस किताबी बातें और आध्यात्म मान लिया गया है। सामाजिक व्यवहार आप कैसे बदलते हैं। डंडे और बंदूक और फांसी के दम पर? क्या इनके खौफ से बलात्कारी घर बैठ जाते हैं। क्या उनके भीतर का पशु भाग खड़ा होता है। वे मनुष्य बन जाते हैं? ऐसा नहीं होता। खूंखारी ऐसे नहीं मरती। एक बहुत ही लंबी और अलग किस्म की लड़ाई चाहिए। एक विराट अलख जगाने का कोई देशव्यापी कार्यक्रम। कोई एक ऐसा आलोडऩ चाहिए, ऐसा एक मूवमेंट और मॉमेंटम जहां हर कोई उठे और प्रतिरोध की नई चेतना बनाए। छोटे छोटे स्तरों पर ये हुआ है। लोग कर रहे हैं। स्त्री आंदोलन हैं। याद कीजिए मणिपुर की महिलाओं का निर्वस्त्र प्रदर्शन। इरोम शर्मिला को देखिए। देश के अन्य हिस्सों में हमलों और शोषणों से उबर कर आई महिलाओं को देखिए। लेकिन ये बिखरी हुई कहानियां हैं, इन्हें एक जगह एक वेग में लाने की जरूरत अब है। वरना इस समाज में तो आदमी भले रह जाएं, आदमियत नहीं रहेगी।
विदेशी महिलाओं के साथ उत्पीडऩ
हाल के दिनों में भारत में विदेशी महिलाओं के साथ उत्पीडऩ के कई मामले सामने आए हैं। इसी साल पोलैंड की एक महिला ने आरोप लगाया था कि दिल्ली में एक टैक्सी ड्राइवर ने उसे धोखे से नशा करा दिया, जिसके बाद उसके साथ बलात्कार हुआ। हालांकि इस मामले को लेकर कुछ गलतफहमियां भी फैली हैं। पिछले महीने एक विदेशी महिला के बलात्कार के मामले में नेपाल के एक युवक को 20 साल कैद की सजा सुनाई गई है। हिमाचल प्रदेश में 39 साल की अमेरिकी महिला के बलात्कार के मामले में भी पिछली जुलाई में छह लोगों को आजीवन कारावास की सजा हुई है। दिल्ली में 2012 के दिसंबर में एक छात्रा के साथ चलती बस में बलात्कार का मामला सामने आने के बाद भारत सरकार ने बलात्कार के मामलों पर गंभीर कदम उठाए हैं और सख्त कानून बनाए गए हैं। हालांकि इसके बाद भी बलात्कार की घटनाओं में बहुत कमी नहीं आई है।
हर 22 मिनट पर बलात्कार
अपेक्षाकृत अधिक सुरक्षित समझी जाने वाली मुम्बई में पिछले आठ माह में बलात्कार की 237 घटनाएं हो चुकी हैं जिनमें से आठ घटनाएं सामूहिक बलात्कार की थीं। जहां तक पूरे देश का सवाल है, भारत में हर 22 मिनट में एक बलात्कार होता है। संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार प्रमुख नवी पिल्लै का कहना है कि बलात्कार भारत की राष्ट्रीय समस्या है।अक्सर गांवों और कस्बों में होने वाले यौन उत्पीडऩ और बलात्कार की घटनाओं की तो कहीं रिपोर्ट तक नहीं होती और इस तरह वे आधिकारिक आंकड़ों से बाहर रहती हैं। अधिकांश मामलों में पीडि़ता शर्म और संकोच के कारण कुछ बोल ही नहीं पाती और उसे रोकने के पीछे समाज का दबाव भी काम करता है। ऐसे मामलों में अक्सर दोष उसी के सर मढ़ दिया जाता है। जिन मामलों में पीडि़त लड़की हिम्मत दिखाती भी है, उनमें भी उसे न्याय मिलने की राह कांटों से भारी होती है। पिछले कुछ दिनों के भीतर दो ऐसे मामले प्रकाश में आये हैं जिन्होंने इस समस्या से सरोकार रखने वालों की नींद तो उड़ा ही दी है, साथ ही यह भी उजागर कर दिया है कि समाज के प्रभावशाली वर्ग के सदस्यों के दुष्कर्मों का पर्दाफाश करना कितना मुश्किल है।
एक सामाजिक परेशानी
यौन उत्पीडऩ का संबंध सत्ता और अधिकार से है और बलात्कार इसका चरम रूप है। यौन उत्पीडऩ की घटनाएं शक्ति प्रदर्शन के प्रयास से पैदा होती हैं और इनमें दूसरे पक्ष की इच्छा या सहमति को कोई महत्व नहीं दिया जाता। अक्सर इनमें एक पक्ष ताकतवर और दूसरा कमजोर होता है। यह शक्ति शारीरिक भी हो सकती है और आर्थिक एवं सामाजिक भी। यह दूसरे के अस्तित्व को नकारने और उसे कुचलने का भी प्रयास है। इसलिए आपसी रंजिश का बदला लेने और जातीय एवं सांप्रदायिक हिंसा की घटनाओं में भी बलात्कार का सहारा लिया जाता है। जो लोग यह मानते हैं कि महिलाएं पश्चिमी वस्त्र पहन कर पुरुषों को आकर्षित करती हैं और एक अर्थ में स्वयं ही यौन उत्पीडऩ को आमंत्रित करती हैं, उन्हें इस सच्चाई को देखना चाहिए कि भारत में बलात्कार की शिकार होने वाली अधिकांश महिलाएं पारंपरिक वस्त्र ही पहनती हैं और यौन उत्पीडऩ का संबंध सत्ता विमर्श से है, वस्त्रों से नहीं। इसलिए तरुण तेजपाल, आसाराम बापू और न्यायमूर्ति गांगुली के मामले अत्यधिक महत्वपूर्ण हैं क्योंकि इनसे पता चलेगा कि भारतीय न्यायव्यवस्था प्रभावशाली लोगों को सजा देने में सक्षम है या नहीं।
पंचायत ने दिया रेप का आदेश
कागजों पर विकास के गगनचुंबी दावों और अंतरराष्ट्रीय बिरादरी को पीछे छोड़ देने की होड़ के बीच भारत में एक गांव की परिषद ने सजा के तौर पर दर्जन भर लोगों को युवती का बलात्कार करने का आदेश दिया।मामला वही पुराना है। 20 साल की लड़की किसी और जाति के लड़के से प्रेम करती थी और मंगलवार रात दोनों को एक साथ बैठे देख लिया गया। आपाधापी में चार लोगों की पंचायत बैठी। उन्होंने तय किया कि लड़की वालों को 25,000 रुपये का जुर्माना देना होगा। पुलिस के मुताबिक जब परिवार वालों ने कहा कि उनके पास पैसे नहीं हैं तो जुर्माना बलात्कार की कीमत पर वसूला गया। पुलिस ने 12 लोगों को गिरफ्तार किया है।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

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