Saturday, October 27, 2012

100 महिलाओं को पकाकर खाना चाहता था पुलिस अधिकारी


कोई पुलिस ऑफिसर ऐसा प्लान बना सकता है, आप हैरत में पड़ जाएंगे! न्यू यॉर्क का एक पुलिस ऑफिसर लंबे समय से 100 महिलाओं को अवन में पकाकर खाने का प्लान बना रहा था। शुक्र है कि उसके मंसूबों का समय रहते पता चल गया। उसे शुक्रवार को अरेस्ट किया गया। ई-मेल्स ने उसका सारा भांडा फोड़ दिया। अमेरिका की फेडरल अथॉरिटीज ने जानकारी दी है।

पुलिस के मुताबिक न्यू यॉर्क पुलिस में तैनात जियबैर्तो वाल्ले एक शख्स से महिलाओं की किडनैपिंग कर उनके अंगों को पकाकर खाने की प्लैनिंग कर रहा था। योजना क्लोरोफॉर्म के जरिए महिलाओं को बेहोश करने और फिर वाल्ले के 28 साल पुराने किचन में लाकर उन्हें पकाने की थी। उसने वहां बड़ा सा अवन भी रखा भी था। दोनों चर्चा कर रहे थे कि अगर किसी महिला के पैर फोल्ड कर दिए जाएं तो अवन में वह पूरी तरह से समा जाएगी। इसके अलावा, ओपन फायर में धीमे-धीमे पकाए जाने के ऑप्शन पर भी वे चर्चा कर रहे थे।

बहरहाल, वाल्ले को गुरुवार रात गिरफ्तार कर लिया गया, लेकिन इस प्लैनिंग में शामिल दूसरे शख्स को नहीं पकड़ा गया क्योंकि उसकी शिनाख्त नहीं हो पाई। हालांकि, दोनों किसी महिला को अब तक नुकसान नहीं पहुंचा पाए।

एफबीआई की असिस्टेंट डायरेक्टर ने कहा कि यह ऐसा आरोप है जिसपर कॉमेंट करना बेहद मुश्किल है। आरोपी के खिलाफ की गई कंप्लेंट अपने आपमे सबकुछ बयान कर रही है। एफबीआई को सितंबर में वाल्ले के प्लान के बारे में पता चला। वाल्ले ने अपने होम कंप्यूटर से इस प्लान के बारे में कई महीनों तक इमेल्स और इंस्टैंट मैसेजेस के जरिए चर्चा की।

वाल्ले के कंप्यूटर से उन 100 महिलाओं का पूरा डेटाबेस मिला, जिन्हें वह अपना शिकार बनाने की योजना बना रहा था। डाटाबेस में नाम, फोटोग्राफ और पर्सनल डीटेल हर तरह का ब्यौरा था। वाल्ले ने इस डेटाबेस को तैयार करने के लिए गैरकानूनी तरीके से लॉ इंन्फोर्समेंट डेटाबेस का इस्तेमाल किया। कुछ पैसे देकर किडनैपिंग के लिए किसी एक और शख्स का इस्तेमाल करना भी उसकी योजना का हिस्सा था।
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मानव तश्करी एक बड़ी चुनौती

मानव तश्करी एक बड़ी चुनौती बन कर उभरी है बिहार के किशनगंज जिले में .नेपाल बंगलादेश सीमा से बिलकुल सटे होने का खामियाजा जिले को उठाना पड़ रहा है जिले में चल रहे चकला घरो में जिन्दगिया बर्बाद हो रही है /नेपाल और बंगलादेश की लडकियो को जहा इन चकला घरो में धकेला जा रहा है वही जिले के ग्रामीण क्षेत्रो की लडकियो को भी बहला फुसला कर इन चकला घरो में गुमनाम जिंदगी जीने को मजबूर किया जा रहा है .सबसे कम साक्षरता दर वाले किशनगंज जिले में मानव तश्करी के जो आकडे सामने आये है वो बड़े ही चौकाने वाले है पिछले ६ महीने में ही दर्जनों लडकियो को बिकने से बचाया गया है कही पुलिस की तत्परता तो कही सामाजिक जागरूकता ने इन लडकियो की जिंदगियो को बर्बाद होने से बचा लिया लेकिन सब इतने भाग्यशाली नहीं है पिछले १० वर्षो में ग़ुम /लापता हुई लडकियो के आकडे(१०० से अधिक ) बेहद ही महत्व रखते है की किस तरह से सिमांचल का यह जिला बेटियो की खरीद फरोख्त का मुख्य केंद्र बन चूका है /रविया ,सोनी ,नुसरत ,फातिमा ,सीमा ,(काल्पनिक नाम )आदि कई ऐसी लडकिया है जो वर्षो से लापता है परिवार वाले ढूंढ़ – ढूंढ़ कर अंत में थक कर बैठ गए आखिर बेचारे करे तो क्या करे इन लडकियो के ग़ुम होने के पीछे कारण भी कोई और नहीं प्रेम की जाल में भोली भाली लडकियो को दलालों ने तो कही कही सगे सम्बंधियो ,पड़ोशियो ने ही कुछ रूपये की खातिर बेच डाला .उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद के एक चकला घर से लौट कर आई एक लड़की को तो उसकी सगी नानी ने ही बेच डाला ऐसे दर्जनों मामले है जहा सौतेली माँ तो कही सौतेला बाप तो कही पति ने ही रूपये के खातिर जिंदगियो का सौदा कर डाला है जिले में दर्जनों चकला घर प्रसाशन और समाज सेवी संगठनों का मुह चिढाते दिख जायेंगे सहरी क्षेत्रो की तो बात जाने दे ग्रामीण क्षेत्रो में भी ये चकला घर मौजूद है जहा साम होते ही रंगीनिया अपने चरम पर होती है और इन रंगीनियो में बचपन को कुचलने का काम खुले आम होता है ऐसा नहीं है की इन चकला घरो के विरोध में स्वर नहीं उठे लेकिन हर उठने वाले स्वर को कुछ दिन बाद दबा देने का काम भी कर दिया जाता है तश्कारो का नेटवर्क इतना मजबूत और हमारा कानून इतना कमजोर है की इसका लाभ खुले आम तश्कारो द्वारा उठाया जाता है कुछ दिन की सजा काटने के बाद ये फिर से अपने धंधे में लग जाते है और एक नया शिकार ढूंढ़ते है /.क्या होता है बचाई गई लडकियो का ? जिन लडकियो को चकला घरो से बचाया जाता है या बच निकलती है उनके लिए सरकार द्वारा अभी तक वैसी कोई कल्याण कारी योजना नहीं बनाई गई है जिससे की उनका जीवन सुधर सके मात्र बचाई गई लडकियो को अल्प आवाश गृह में कुछ दिन के लिए रख दिया जाता है बाद में ये लडकिया यदि परिजनों ने स्वीकार किया तो अपने घर चली गई या फिर से चकला घर पहुचने को मजबूर हो जाती है यही इनकी नियति बन जाती है हलाकि कई गैर सरकारी संगठन माना तश्करी पर कार्य कर रही है लेकिन इनका काम कागजो पर ही सिमटा हुआ है ऐसे में जरुरत है की मानव तश्करी के पुरे नेटवर्क को जड़ से समाप्त किया जाये लोगो में बड़े पैमाने पर जागरूकता अभियान चलया जाये जिससे की बचपन काल कोठरी में गुमनाम होने से बच सके .
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हम चाहें, तो रूकेंगे अपराध
 
हम आए दिन सार्वजनिक स्थानों पर महिलाओं के उत्पीड़न की घटनाएं सुनते रहते हैं, क्या इसके लिए हमारी नीतियां ही त्रुटिपूर्ण हैं? महिलाओं के सार्वजनिक स्थान पर खुलेआम उत्पीडित होने की घटनाएं अब अकसर होने लगी हैं। उत्पीड़न की इन अधिकांश घटनाओं के मूल में पब संस्कृति होती है और ये घटनाएं ऎसी जगहों पर होती हैं, जहां लोग फुरसत के क्षणों में मनोरंजन के लिए एकत्रित होते हैं।ज्यादातर ऎसी घटनाएं शाम के समय ही होती हैं। अब तो यह भी देखा जाने लगा है कि इन घटनाओं को लेकर लोगों का गुस्सा जब भड़कता है, तो लोग मूकदर्शक ही बने रहना ज्यादा श्रेयस्कर समझते हैं। इसमें दखल देने की न तो कोई चिंता करता है और न ही कोई परवाह करता है। हालांकि कुछ लोगों के लिए ऎसी घटनाएं एक अवसर की तरह होती हैं कि उन्होंने विरोध-प्रदर्शनों में अपनी भागीदारी निभाई।

सोशल नेटवर्किग साइट्स पर ये मामले विषाणु की तरह फैल जाते हैं। मीडिया उन्हें उछालता है। टीवी चैनलों पर विचार-विमर्श का दौर शुरू हो जाता है। दुर्भाग्यपूर्ण तो यह है कि पुलिस हमेशा की तरह या तो देरी से पहुंचती है या चूक जाती है अथवा मामले के प्रति ढिलाई बरत देती है। मैंने कई फोरम पर इस संदर्भ में विचार-विमर्श में भाग लिया है, अपने विचार साझा किए हैं। जागरूक नागरिकों के अधिकारों को लेकर कुछ सुझाव यहां पेश कर रही हूं।

हमें यह भलीभांति मालूम है कि पुलिस का पहला कत्तüव्य अपराध रोकना है, इसके लिए उसे व्यवस्थित रूप से घरेलू स्तर पर काम करना चाहिए, खुफिया नेटवर्क को मजबूत करना चाहिए। इसका अर्थ यह है कि पुलिस के पास जो भी संसाधन मौजूद हैं, चाहे वह पुलिस बल हो या पुलिस नियंत्रण कक्ष की गाडियां, मोटरसाइकिल, स्वयंसेवी कार्यकर्ता, होमगार्ड, नागरिक सुरक्षा के लोग, वायरलैस सैट्स, कैमरा आदि, वे सब इस हालात में होने चाहिए कि जहां भी गुंडागर्दी या असामाजिक तत्वों के जमावड

विडियो क्लिपिंग का डर दिखा करते रहे गैंगरेप


यूपी के बुलंदशहर की एक कंपनी में जॉब करने वाली महिला के साथ गैंगरेप का मामला सामने आया है। आरोप है कि तीन महीने पहले मिठाई में नशीला पदार्थ खिलाकर दो युवकों ने गैंगरेप की वारदात को अंजाम दिया। दोनों युवकों ने गैंगरेप का विडियो बनाकर कई लोगों को बांट दिया। महिला ने इस बारे में पुलिस से शिकायत की लेकिन उसे जांच का आश्वासन देकर टरका दिया गया।

एसएसपी को दी तहरीर में महिला के पति ने आरोप लगाया है कि 3 मार्च को उनकी पत्नी के साथ दो युवकों ने गैंगरेप किया। इसके बाद आरोपियों ने इस घटना का विडियो तैयार कर लिया। दोनों आरोपियों ने क्लिपिंग से ब्लैकमेलिंग करते हुए लगातार तीन महीने तक गैंगरेप किया। महिला ने नौकरी छोड़ दी है, पर आरोपी अब भी उनसे रेप करना चाहते हैं। विरोध करने पर वे जान से मारने की धमकी दे रहे हैं।

बुधवार को महिला के पति ने एसएसपी से मिलकर सुरक्षा की गुहार लगाई। उन्होंने एसएसपी को बताया कि गैंगरेप के दोनों आरोपी खुर्जा के रहने वाले हैं। उनका आरोप है कि पुलिस वारदात की विडियो फुटेज मांग रही है। एसएसपी गुलाब सिंह ने जांच कर कार्रवाई का भरोसा दिया है।

महिला का कहना है कि पुलिस आरोपियों के खिलाफ कार्रवाई करने से कतरा रही है। अगर पुलिस से उन्हें न्याय नहीं मिला तो वह कोर्ट की शरण में जाएंगी।


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दोस्त ही दोस्त की आबरू की दुश्मन
लखनऊ। जब दोस्त ही ऎसी हरकत पर उतर आए तो साथी किस पर विश्वास करे। यहां पर एक सहेली ने ही अपनी दोस्त की आबरू को तार-तार कर दिया। उत्तर प्रदेश के देवरिया एक स्कूल में पढने वाली छात्रा ने अपनी एक सहेली को एक सुनसान इलाके में बुलाया और जहां स्कूल के शिक्षामित्र ने उससे बलात्कार किया जबकि छात्रा ने इस दुराचार का एमएमएस बना लिया। मामला उस वक्त खुला जब पीडित की शिकायत पर पुलिस ने आरोपी छात्रा को गिरफ्तार किया। हालांकि दुराचार करने वाला शिक्षा मित्र अभी भी फरार है।

गौरतलब है कि देवरिया सेलमपुर के इचौना गांव निवासी पूजा (काल्पनिक नाम) गांव में ही स्थित इंटर कालेज में पढती है। 20 अक्टूबर को पूजा की सहेली संगीता ने उसको धोखे से गांव के बाहर के एक सुनसान इलाके में बुलाया।

वह उसे गांव के बाहर बनी झोपडी में ले गयी। झोपडी में पहले से कालेज में पढाने वाला शिक्षा मित्र नन्हे मौजूद था। नन्हे ने छात्रा के साथ झोपडी में दुराचार किया और वहां मौजूद पूजा की सहेली संगीता ने उसका एमएमएस बना लिया।

घटना के बाद पीडित छात्रा ने इस बात की जानकारी अपने घरवालों को दी। घरवालों ने पूरा मामला समझने के बाद इसकी शिकायत सलेमपुर थाने में दर्ज करायी। पुलिस ने भी मामले की गंभीरता को देखते हुए तत्काल रिपोर्ट दर्ज की और पीडित युवती को मेडिकल परीक्षण के लिए भेज दिया।
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पति बोला, ससुर से सेक्स में बुरा क्या!

शादी हुए कुछ ही दिन बीते थे कि बहू की खूबसूरती पर ससुर इस कदर फिदा हुआ कि वह आए दिन उसके साथ शारीरिक छेड़छाड़ करने लगा। परिवार की इज्जत की खातिर पहले तो वह चुपचाप सहती रही, मगर जब उसकी चुप्पी से ससुर के हौसले बढ़ते चले गए और उसने फिजिकल रिलेशन बनाने के लिए जोर जबर्दस्ती शुरू कर दी।

जब बर्दाश्त से बाहर हो गया तो उसने पति को पूरी बात बता दी, मगर जिसके साथ सात फेरे लिए उसकी बात सुनकर वह हैरान रह गई। पति ने कहा कि सेक्स करने में बुराई क्या है। फिर क्या था.... बहू अपनी ससुराल छोड़कर मायके आ गई और सारी बात परिवार को बता दी। अब पति और ससुर पर युवती ने केस दर्ज कराया है।पुलिस सूत्रों से मिली जानकारी के मुताबिक दिल्ली के नारायणा में परिवार के साथ रहने वाली 20 वर्षीय शालिनी (बदला हुआ नाम) के पिता सरकारी पद पर कार्यरत हैं। जून 2010 में शालिनी की शादी कोलकाता स्थित सियालदाह में सनी प्रसाद के धूमधाम के साथ हुई थी। शालिनी का आरोप है कि शादी के कुछ ही दिनों बाद उसका ससुर खूबसूरती की तारीफ करते हुए शारीरिक छेड़छाड़ करने लगा। शुरुआत में यह सब चुपचाप सहती रही मगर बाद में शालिनी से रहा नहीं गया तो उसने पति से शिकायत कर दी।

हैरानी उसे तब हुई जब उसके पति ने भी यह कहा कि हाईप्रोफाइल सोसायटी में यह सब चलता है और सेक्स करने में कोई बुराई नहीं है। ससुराल में यह सब नजारा देखकर उससे रहा नहीं गया और कोलकाता से दिल्ली आ गई। उसने मायके में आकर सारी बात बताई। फिलहाल पति और ससुर के खिलाफ नारायणा थाने में केस दर्ज कराया गया है। पुलिस टीम दोनों की गिरफ्तारी के लिए कोलकाता रवाना की गई है।
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बीवी से जबरन पर पुजारी को एक साल की जेल

अंबाला में शुक्रवार को लोकल कोर्ट ने पत्नी से जबरन शारीरिक संबंध बनाने पर मंदिर के एक पुजारी को एक साल की सजा सुनाई। अदालत ने पुजारी को बाद में जमानत पर रिहा कर दिया।

मामले के अनुसार अंबाला कैंट के रामबाग मंदिर के पुजारी 44 वर्षीय शिवपुरी की पत्नी 36 वर्षीय गुरदेव कौर ने पुलिस को दी शिकायत में कहा था कि उनका अपने पति से खर्चे को लेकर मामला अदालत में चल रहा था, लेकिन दोनों पति-पत्नी डेरे में एक ही परिसर में रहते थे।

उन्होंने पुलिस को बताया था कि 10 मई की रात पति नशे में डूबा हुआ आया और जबरन शारीरिक संबंध बनाए। गुरदेव कौर की शिकायत पर पुलिस ने शिवपुरी के खिलाफ मामला दर्ज कर लिया था। पुलिस ने कौर की मेडिकल जांच भी करवाई जिसमें उससे शारीरिक संबंध बनाए जाने की पुष्टि भी हुई। 
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यहां सामान नहीं औरतें बिकती हैं 
महिलाओं को उपभोग की वस्तु समझा जाता है जिसका कोई भी पुरुष उपभोग कर सकता है शर्त यह है कि उस पुरुष के पास उस महिला के साथ रात गुजारने की कीमत होनी चाहिए.

प्यार या फिर देह व्यापार के लिए धोखा
मानव तस्करों ने देह व्यापार को व्यापक बनाने के लिए प्यार और धोखे जैसा खेल खेलना शुरु कर दिया है. आपको याद होगा सोफी नाम की महिला जिसके साथ उसके प्रेमी ने प्यार का खेल खेला फिर उसे बाजार में बेच आया.

मानव तस्करी की शिकार बनी सोफी का कहना था कि किस तरह वो अपने कथित प्रेमी के चंगुल में फंस गई और फिर उससे जबरन वेश्यावृत्ति के धंधे में ढकेल दिया गया. सोफी ने यह भी बताया कि उसका प्रेमी जब शुरुआती समय में उससे मिला था तो उसने अपनी पहचान गलत बताई थी. अधिकांश मानव तस्कर युवतियों को अपने प्रेम जाल में फंसाने के लिए अपनी गलत पहचान ही बताते है और यदि युवती उनके प्रेम जाल में फंस जाए तो वो उसे वेश्या बनने पर मजबूर कर देते है. बहुत बार ऐसा देखा गया है कि यदि युवती अपने शरीर की कीमत लगाने से मना कर देती है तो मानव तस्कर युवती का अश्लील एमएमएस बनाकर बाजार में बेचने की घमकियां देते है.

नशीले पदार्थ का सहारा
22 वर्षीय पीड़ित महिला मोनिका की कहानी ऐसी है जो इस बात का अहसास करवाती है कि किसी अजनबी पर विशवास नहीं करना चाहिए. मोनिका ने बताया कि उसके गांव में एक दिन एक महिला आई थी जिसने नौकरी लगवाने का वायदा किया फिर कुछ ऐसा खाने के लिए दिया जिससे थोड़े समय बाद ही मोनिका को चक्कर आने लगे और जब उसकी आंख खुली तो वो किसी ऐजेंट को बेची जा चुकी थी. मानव तस्कर वेश्या बजार में महिलाओं को बेचने और खरीदने के लिए अधिकांश महिला एजेंट का सहारा लेते है जिस कारण यह कहना मुश्किल है कि महिलाओं की तस्करी केवल पुरुष ही करते है.

सीमापार तस्करी
मानव तस्करी का बड़ा व्यापार सीमापार से किया जाता है. फिर चाहे भारत से ले जाकर महिलाओं को बाहर बेचा जाए या फिर भारत की सीमापार से लाकर महिलाओं को भारत में बेचा जाए. बागलादेश और भारत की सीमा 4000 किलोमीटर से भी कहीं ज्यादा है. बागलादेशी लड़कियों को भारत मे नौकरी का झांसा दिया जाता है और बाद में उन्हें भारत के विभिन्न शहरों में यौनकर्मियों के तौर पर बेच दिया जाता है.

अंतर्राष्ट्र्रीय स्तर पर भी मानव तस्करी का व्यापार खुले में किया जाता है. ऑस्ट्रेलिया में बेची जाने वाली ज्यादातर महिलाएं एशिया और यूरोप से ही लाई जाती है. इन महिलाओं को अक्सर नौकरी और कॉलेजों में दाख़िले का झांसा देकर लाया जाता है.
मानव तस्करी का शिकार हुई महिलाओं का कहना है कि यदि अंतरराष्ट्रीय सीमा पर चौकसी कड़ी की जाए तो मानव तस्करी जैसे व्यापार पर कुछ सीमा तक काबू पाया जा सकता है.
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मां से बलात्कार करने वाले युवक को आजीवन कैद
दिल्ली की एक अदालत ने मां से बलात्कार करने वाले युवक को आजीवन कारावास की सजा सुनाई है। अदालत ने कहा कि युवक ने इस 'घृणित' कृत्य से मनुष्य और पशुओं के बीच के अंतर को समाप्त करने का प्रयास किया है।

अदालत ने नंद किशोर को सजा सुनाते हुए कहा कि दोषी ठहराए गए नंद किशोर पर इससे पहले पिता की हत्या के आरोप में मुकदमा चला था। लेकिन अदालत ने उसे बरी कर दिया था और वह जेल से छूट गया था। इस वर्ष की शुरुआत में जेल से बाहर आने के बाद उसने अपनी मां से बलात्कार किया।

अदालत ने कहा कि दोषी किसी भी तरह की दया के काबिल नहीं है और उसके खिलाफ यदि कोई उदारता दिखाई गई तो इसका गलत अर्थ निकाला जाएगा क्योंकि उच्चतम न्यायालय ने भी कहा है कि यौन अपराधों के मामलों में उदारता ना केवल अवांछनीय है बल्कि यह जनहित के भी खिलाफ है।


Tuesday, October 23, 2012

जब कन्या ही नहीं होगी तो कन्या पूजन कैसा!


नवरात्र के आठवें और नौवें दिन कन्या पूजन का विधान होता है. भारत में जहां एक तरफ कन्या भ्रूण हत्या और महिलाओं से बलात्कार की घटनाएं अपने चरम पर हैं वहीं दूसरी ओर कन्याओं को पूजने का रिवाज आपको बहुत हद तक एक-दूसरे का विरोधाभास करते नजर आएगा. लेकिन भारत शायद इसी का नाम है जहां भक्ति और आस्था हर धर्म, मजहब और सामाजिक कारकों से ऊपर है. आज के इस अंक में हम जानेंगे कि दुर्गाष्टमी और नवमी के दिन कन्या पूजन क्यूं और कैसे किया जाता है?
नवरात्र पर्व: कन्या पूजन
नवरात्र पर्व के दौरान कन्या पूजन का बडा महत्व है. नौ कन्याओं को नौ देवियों के प्रतिविंब के रूप में पूजने के बाद ही भक्त का नवरात्र व्रत पूरा होता है. अपने सामर्थ्य के अनुसार उन्हें भोग लगाकर दक्षिणा देने मात्र से ही मां दुर्गा प्रसन्न हो जाती हैं और भक्तों को उनका मनचाहा वरदान देती हैं.
किस दिन करें कन्या पूजन
कुछ लोग नवमी के दिन भी कन्या पूजन करते हैं लेकिन अष्टमी के दिन कन्या पूजन करना श्रेष्ठ रहता है. कन्याओं की संख्या 9 हो तो अति उत्तम नहीं तो दो कन्याओं से भी काम चल सकता है.

कन्या पूजन विधि
सबसे पहले कन्याओं के दूध से पैर पूजने चाहिए. पैरों पर अक्षत, फूल और कुंकुम लगाना चाहिए. इसके बाद भगवती का ध्यान करते हुए सबको भोग अर्पित करना चाहिए अर्थात सबको खाने के लिए प्रसाद देना चाहिए. अधिकतर लोग इस दिन प्रसाद के रूप में हलवा-पूरी देते हैं. जब सभी कन्याएं खाना खा लें तो उन्हें दक्षिणा अर्थात उपहार स्वरूप कुछ देना चाहिए. फिर सभी के पैर को छूकर आशीर्वाद लेना चाहिए. इसके बाद इन्हें ससम्मान विदा करना चाहिए.
नवरात्र पर्व: कितनी हो कन्याओं की उम्र
ऐसा माना जाता है कि दो से दस वर्ष तक की कन्या देवी के शक्ति स्वरूप की प्रतीक होती हैं. कन्याओं की आयु 2 वर्ष से ऊपर तथा 10 वर्ष से अधिक नहीं होनी चाहिए. दो वर्ष की कन्या कुमारी , तीन वर्ष की कन्या त्रिमूर्ति , चार वर्ष की कन्या कल्याणी , पांच वर्ष की कन्या रोहिणी, छह वर्ष की कन्या कालिका , सात वर्ष की चंडिका , आठ वर्ष की कन्या शांभवी , नौ वर्ष की कन्या दुर्गा तथा दस वर्ष की कन्या सुभद्रा मानी जाती है. इनको नमस्कार करने के मंत्र निम्नलिखित हैं.
1. कौमाटर्यै नम:
2. त्रिमूर्त्यै नम:
3. कल्याण्यै नम:
4. रोहिर्ण्य नम:
5. कालिकायै नम:
6. चण्डिकार्य नम:
7. शम्भव्यै नम:
8. दुर्गायै नम:
9. सुभद्रायै नम:

आइए अब सिलसिलेवार तरीके से जानें कि इन देवियों का रूप और महत्व क्या है:

1.  हिंदू धर्म में दो वर्ष की कन्या को कुमारी कहा जाता है. ऐसी मान्यता है कि इसके पूजन से दुख और दरिद्रता समाप्त हो जाती है.
2.  तीन वर्ष की कन्या त्रिमूर्ति मानी जाती है. त्रिमूर्ति के पूजन से धन-धान्य का आगमन और संपूर्ण परिवार का कल्याण होता है.
3.  चार वर्ष की कन्या कल्याणी के नाम से संबोधित की जाती है. कल्याणी की पूजा से सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है.
4.  पांच वर्ष की कन्या रोहिणी कही जाती है. रोहिणी के पूजन से व्यक्ति रोग-मुक्त होता है.
5.  छ:वर्ष की कन्या कालिका की अर्चना से विद्या, विजय, राजयोग की प्राप्ति होती है.
6.  सात वर्ष की कन्या चण्डिका के पूजन से ऐश्वर्य मिलता है.
7.  आठ वर्ष की कन्या शाम्भवी की पूजा से वाद-विवाद में विजय होती है.
8.  नौ वर्ष की कन्या को दुर्गा कहा जाता है. किसी कठिन कार्य को सिद्धि करने तथा दुष्ट का दमन करने के उद्देश्य से दुर्गा की पूजा की जाती है.
9.  दस वर्ष की कन्या को सुभद्रा कहते हैं. इनकी पूजा से लोक-परलोक दोनों में सुख प्राप्त होता है.

कितना सार्थक है भारत में कन्या पूजन
नवरात्र पर कन्या पूजन के लिए कन्याओं की 7, 9 या 11 की संख्या मन्नत के मुताबिक पूरी करने में ही पसीना आ जाता है. सीधी सी बात है जब तक समाज कन्या को इस संसार में आने ही नहीं देगा तो फिर पूजन करने के लिये वे कहां से मिलेंगी.

जिस भारतवर्ष में कन्या को देवी के रूप में पूजा जाता है, वहां आज सर्वाधिक अपराध कन्याओं के प्रति ही हो रहे हैं. यूं तो जिस समाज में कन्याओं को संरक्षण, समुचित सम्मान और पुत्रों के बराबर स्थान नहीं हो उसे कन्या पूजन का कोई नैतिक अधिकार नहीं है. लेकिन यह हमारी पुरानी परंपरा है जिसे हम निभा रहे हैं और कुछ लोग शायद ढो रहे हैं. जब तक हम कन्याओं को यथार्थ में महाशक्ति, यानि देवी का प्रसाद नहीं मानेंगे, तब तक कन्या-पूजन नितान्त ढोंग ही रहेगा. सच तो यह है कि शास्त्रों में कन्या-पूजन का विधान समाज में उसकी महत्ता को स्थापित करने के लिये ही बनाया गया है.

उम्मीद है आस्था और हमारी परंपरा का नवरात्र पर्व समाज में कन्याओं की गिरती संख्या की तरफ भी लोगों का ध्यानाकर्षित करेगा और आने वाले समय में देश के अंदर कन्या भ्रूण हत्या जैसे मामलों में कमी आएगी और महिलाओं की सुरक्षा में इजाफा होगा.

डायन! सच्चाई या षड्यंत्र?



किसी आदिवासी महिला को डायन बताकर उसे प्रताडित करने के समाचार हम आए दिन पढ़ते हैं या सुनते हैं। इस संदर्भ में एक प्रश्न उभरता है कि क्या आदिवासी समाज में डायन का होना एक सच्चाई है या मात्र अंधविश्वास? सत्य तो यह है कि डायन सच्चाई तो है ही नहीं। यह आदिवासी समाज में दबदबा रखने वाले दुश्चरित्र समाजकंटकों की कुटिल चाल होती है। यही वे व्यक्ति होते हैं, जो कि आदिवासियों की अशिक्षा और भोलेपन का नाजायज फायदा उठाकर किसी महिला को डायन करार देकर उसे प्रताडित करते हैं, यहां तक उसकी हत्या तक के लिए समाजजनों को उकसाते हैं।

आखिर वे ऎसा क्यों करते हैं? अनेक कारण हो सकते हैं, जैसे-डायन घोषित की गई महिला द्वारा ग्राम के किसी तथाकथित प्रभावी व्यक्ति की कुत्सित इच्छा की पूर्ति न करना, ग्रामजनों के समक्ष उसका असली चेहरा उजागर करने का प्रयास करना, प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप में उसे हानि पहंुचाने या उसकी अवमानना करने का प्रयास करना, उसके अनैतिक कायोंü में बाधा पहुंचाना, ग्राम की महिलाओं का नेतृत्व करने का प्रयास करना आदि। किसी स्त्री को डायन घोषित करने के अन्य कारण भी हो सकते हैं, जैसे उस स्त्री के परिवार के साथ ग्राम के किसी प्रभावी व्यक्ति की दुश्मनी होना, भूमि संबंधी विवाद, उसके पति द्वारा ग्राम के किसी प्रभावी व्यक्ति का अनैतिक कायोंü में सहयोग न करना या विरोध करना आदि।

कभी-कभी स्त्री का पति या परिवार के सदस्य भी उसे डायन बताकर लांछित, प्रताडित और अपमानित कर उसका जीवन नारकीय बना देते हैं। ऎसा वे तब करते हैं, जबकि परिवार के सदस्यों को उस स्त्री के चरित्र पर शंका हो अथवा उसे संतान न हो रही हो। निश्चय ही इसमें समाजकंटक भी उनको उकसाने में बड़ी भूमिका निभाते हैं। पहले तो ग्राम के ऎसे स्त्री-पुरूषों की तलाश की जाती है, जिनकी उस स्त्री या उसके परिवार से न बनती हो, वैमनस्य हो, ईश्र्या-द्वेष या विरोध हो। ऎसे लोगों को उस स्त्री के विरूद्ध अनर्गल बातें कर उन्हें उकसाया जाता है। धीरे-धीरे ऎसे समूह का विस्तार होता जाता है। फिर उसके डायन होने का दुष्प्रचार किया जाता है। इसके साथ ही उसे सार्वजनिक रूप से डायन घोषित कर प्रताडित करने के लिए उचित अवसर की तलाश की जाती है। ऎसा अवसर उन्हें, तब मिलता है, जब ग्राम में कोई महामारी फैले, बड़ी संख्या में बच्चों, माताओं या पशुओं की मृत्यु हो, खेतों-खलीहानों में आग लग जाए या इसी प्रकार की कोई अन्य आपदा आ जाए।

इसमें से कोई भी घटना घटित होने पर वे पारंपरिक पंचायत की बैठक बुलाते हैं। पंचायत ग्राम के ओझा, जिसे पुजारा, भूमका, पडिहार या बड़वा कहा जाता है, को निर्देष देती है कि वह आत्माओं की पूजा-अर्चना या बली-तर्पण कर पता लगाए कि ग्राम में यह विपत्ति क्यों आई है? कहना न होगा दुश्चक्र चलाने वाले व्यक्ति पहले ही ओझा को साध लेते हैं। वह पूजा, तर्पण आदि का ढोंग रचकर घोषित करता है कि फलॉ स्त्री डायन है और वही इस आपदा के लिए उत्तरदायी है। वह यह भी घोषित करता है कि आपदा से मुक्ति पाने के लिए डायन के साथ क्या किया जाए। दंडस्वरूप उसका ग्राम से निष्कासन बहुत साधारण बात है, इसलिए प्राय: इस प्रकार की सजा नहीं दी जाती है। आमतौर पर डायन घोषित स्त्री को निर्वस्त्र कर ग्राम में घुमाया जाता है, उसे गालियां दी जाती हैं, उस पर पत्थर फेंके जाते हैं, उसके बाल पकड़कर उसे घसीटा जाता है और इसी तरह की अन्य प्रताड़नाएं दी जाती हैं।

वह रोती है, प्रार्थना करती है, अपने निर्दोष होने की बात कहती है, पर उसकी बात नहीं सुनी जाती है। ऎसा तब तक किया जाता है, जब तक वह बेहोश होकर गिर न पड़े। बेहोश होने पर उसे घसीटकर गांव से बाहर फेंक दिया जाता है। इस बीच उसके मां-बाप भी समाज के भय से उसका साथ नहीं दे पाते हैं। मां-बाप, ससुराल वाले खासकर पति भी उसी समाज के होने के कारण डायन संबंधी भ्रांति से ग्रस्त रहते हैं। डायन घोषित होने और उसे प्रताडित करने से ही मामला खत्म नहीं हो जाता है। उस स्त्री का कोई साथ नहीं देता है। उसके खाने-पीने के लाले पड़ जाते हैं।

उसे भीख देना तो दूर, कोई उसे अपने द्वार पर खड़ा भी नहीं होने देता। मनचले और गैरकानूनी कार्य करने वाले लोग उसे घेर लेते हैं। वह भी बेबस रहती है। अपनी रक्षा के लिए उसे किसी न किसी का साथ तो चाहिए ही। इसलिए वह नारकीय जीवन जीने के लिए बाध्य होती है। बहुत कम मामलों में पीडित स्त्री, उसके परिवार का कोई सदस्य या नातेदार पुलिस को शिकायत करता है। रिपोर्ट दर्ज करने पर पुलिस कार्रवाई करती है, परन्तु पुलिस का काम करने का अपना तरीका होता है। ऎसे मामलों में गवाही देने वाले भी सहज नहीं मिलते हैं। यदि मिल जाएं तो भी मामला महीनों नहीं सालों चलता है। कभी-कभी अपराधियों को दंड भी मिलता है। पर डायन घोषित उस स्त्री को इससे क्या मिलता है?
 

किसी महिला को डायन क्यों बनाया जाता है?

राष्ट्रीय महिला आयोग का कहना है कि भारत के पचास से ज्यादा जिलों में डायन प्रथा है

भारत में राष्ट्रीय महिला आयोग ने डायन प्रथा पर केंद्रीय कानून बनाने का काम शुरू कर दिया है.

डायन प्रथा के बढ़ते प्रभाव के मद्देनजर झारखण्ड जैसे राज्यों ने पहले ही कानून बना लिए हैं. अब छत्तीसगढ़, राजस्थान और हरियाणा भी इसी राह पर हैं.
कुछ सामाजिक कार्यकर्ताओ का कहना है कि मौजूदा कानून के तहत भी कार्रवाई की जा सकती है, मगर पुलिस इसमें कोई रूचि नहीं लेती.
डायन प्रथा के नाम पर महिलाओं के उत्पीड़न की घटनाएं रह-रहकर सर उठाती रही हैं.

बोली देवी की कहानी

बोली देवी विश्नोई एक औरत हैं, वो इन्सान भी हैं, मगर समाज के एक हिस्से ने भीलवाड़ा की इस महिला को डायन नामजद कर दिया.
इसके साथ ही बोली देवी और उनके परिवार पर विपत्तियों का पहाड़ टूट पड़ा. बोली ने जब आपबीती बयान की तो उनकी आँखे छलछला गईं.
वे कहती हैं, ''मुझे और मेरे परिवार को आठ साल हो गए जब गाँव में जाति के लोगों ने डाकन या डायन करार दिया. तब से जिंदगी नारकीय हो गई है. बाहर आना-जाना बंद है. बड़ी घुटन होती है. यहाँ तक कि मेरी दो पुत्र- वधुओं को भी मेरा साथ देने पर जगह-जगह बेइज्जत किया गया.''
"मुझे और मेरे परिवार को आठ साल हो गए जब गाँव में जाति के लोगों ने डाकन या डायन करार दिया. तब से जिंदगी नारकीय हो गई है. बाहर आना-जाना बंद है. यहाँ तक कि मेरी दो पुत्र- वधुओं को भी मेरा साथ देने पर जगह-जगह बेइज्जत किया गया."

बोली देवी

बोली देवी के पति सरकारी कर्मचारी थे, लेकिन दबाव और तनाव में नौकरी को तिलांजलि दे दी. बोली देवी जहाँ भी जाती हैं, लोगों से कभी कातर-कंठ से तो कभी गुस्से में पूछती हैं कि क्या वो उन्हें डाकन नजर आती हैं?
पर जवाब न समाज देता है और न ही सरकार.
 
''बहुत छोटी-छोटी बात के लिए औरत को जिम्मेदार बताकर डायन करार दे दिया गया. जैसे गाय ने दूध देना बंद कर दिया, कुँए में पानी सूख गया, किसी बच्चे की मौत हो गई तो अन्धविश्वास के चलते औरत को डायन घोषित कर दिया गया.
कई मामलों में सम्पत्ति हड़पने की नीयत से भी महिलाओं को डायन करार दिया गया.
"बहुत छोटी-छोटी बात के लिए औरत को जिम्मेदार बताकर डायन करार दे दिया गया. जैसे गाय ने दूध देना बंद कर दिया, कुए में पानी सूख गया, किसी बच्चे की मौत हो गई तो अन्धविश्वास के चलते औरत को डायन घोषित कर दिया गया."

डायन करार दी गईं औरतों के साथ बहुत ही पाशविक बर्ताव किया गया.

यौन अत्याचार, उनके बाल काट देना, मुंडन कर देना और फिर गांव से बहार निकाल देना भी इसमें शामिल है. इन पीडितों में से कुछ ऐसी भी थीं जिनके पास तन ढँकने के लिए कपड़े तक नहीं छोड़े गए. कुछ के मुंह में मल-मूत्र तक ठूँसा गया.
फिर इन घटनाओं से इन महिलाओं का छोटा-मोटा रोजगार भी छिन गया. कुछ को ताले में बंद रखा जा रहा था तो कुछ को गांव के बाहर रखा जाता था.
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महिलाओं के साथ अपराध

अगर भारत में महिलाओं के साथ होने वाले अपराधों की बढ़ोतरी की दर इतनी ज्यादा है कि उसने अन्य सभी अपराधों को पीछे छोड़ दिया है , तो यह कोई हैरानी की बात नहीं है। देश में डेमोक्रेसी के साथ सामाजिक मूल्यों के दोहरेपन का भी विकास हुआ है। नैशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो ( एनसीआरबी ) के मुताबिक 1971 में देश में रेप के कुल 2043 केस दर्ज किए गए थे। वर्ष 2011 में ऐसे मामलों की संख्या 24 हजार को पार कर गई। सारे राज्यों के मुकाबले मध्य प्रदेश में रेप के सबसे ज्यादा मामले दर्ज किए गए। लेकिन भद्रलोक कहलाने वाले राज्य पश्चिम बंगाल का दूसरे नंबर पर होना एक ऐसी कड़वी सचाई की तरफ संकेत करता है जिससे लगता है कि पढ़ाई - लिखाई से आने वाली नैतिकता इस मामले में बेअसर साबित हो रही है।

महिलाओं के साथ सबसे ज्यादा अपराध सर्वाधिक साक्षरता वाले राज्य केरल में हो रहे हैं। इसके लिए सिर्फ लचर कानून व्यवस्था को दोषी ठहरना इस समस्या को सीमित ढंग से देखना है। अगर कोई महिला अपने दफ्तर से देर रात घर जाते हुए महफूज नहीं है तो इसके लिए पुलिस तंत्र को कोसा जाता है। पर यदि दिनदहाड़े किसी महिला से सार्वजनिक जगह पर बदतमीजी होती है , तो यह सिर्फ कानून व्यवस्था का मामला नहीं है। इससे हमारे ही बीच मौजूद कुछ लोगों की विकृत सोच उजागर होती है। ऐसे लोगों की नजर में स्त्री सिर्फ उपभोग की वस्तु है। घर से बाहर पांव रख रही स्त्री उनके लिए आसान शिकार होती है।

इधर देश में महिलाओं की सार्वजनिक मौजूदगी काफी ज्यादा बढ़ी है। यह सिर्फ महिलाओं का घर से बाहर आना मात्र नहीं है। बल्कि महिलाएं उन सभी क्षेत्रों में पुरुषों से आगे निकल रही हैं या उनसे बेहतर साबित हो रही हैं , जिनमें कभी मर्दों का दबदबा रहा है। घटिया मानसिकता वाले पुरुषों को स्त्री का यह दखल बर्दाश्त नहीं हो रहा है। इसीलिए कभी महिलाओं के कपड़ों को , तो कभी देर रात तक उनके घर से बाहर रहने को उनके साथ होने वाले अपराधों की वजह बताने की कोशिश की जाती है। लेकिन उनके खिलाफ अपराधों में कमी लाने के लिए योजनाबद्ध और संगठित उपाय तो सरकार ही कर सकती है। जैसे थानों में पीड़ित महिलाओं के लिए विशेष सेल बनाए जा सकते हैं , उनकी किसी भी शिकायत पर तुरंत कार्रवाई अनिवार्य बनाया जा सकता है और साफ कानून बनाए जा सकते
हैं।
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छेड़छाड़ करने पर मिलेगी रेप से सख्त सजा

 रेप की परिभाषा बदलने को कैबिनेट की मंजूरी के बाद रेप को जेंडर न्यूट्रल क्राइम बनाया जाएगा और रेप शब्द की जगह ज्यादा असरदार शब्द सेक्शुअल असॉल्ट का इस्तेमाल किया जाएगा। कानूनी जानकारों के मुताबिक प्रस्तावित कानून का ज्यादा असर होगा और इससे महिलाओं के साथ-साथ बाल अपराधों पर भी रोक लगाने में मदद मिलेगी।

अभी क्या है मौजूद सिस्टम
कानूनी जानकार बताते हैं कि अभी आईपीसी की धारा-375 के अनुसार महिला की मर्जी के बिना (या 16 साल तक की नाबालिग लड़की के साथ) फिजिकल रिलेशन बनाने (सेक्सुअल ऑर्गन के पेनेट्रेशन) को रेप माना जाता है। लेकिन अगर रेप के बदले सेक्शुअल असॉल्ट (यौन शोषण) शब्द का इस्तेमाल होता है तो दायरा काफी बढ़ जाएगा।
सुप्रीम कोर्ट में क्रिमिनल लॉयर डी. बी. गोस्वामी ने बताया कि अगर रेप की जगह यौन शोषण शब्द का प्रयोग किया जाएगा और इसे जेंडर न्यूट्रल किए जाने से यह कानून काफी असरदार हो जाएगा। धारा-375 के तहत रेप को परिभाषित किया गया है। रेप तभी माना जाता है जब सेक्सुअल ऑर्गन में पेनेट्रेशन हो लेकिन जब रेप शब्द को हटा कर उसकी जगह सेक्सुअल असॉल्ट शब्द का इस्तेमाल होगा तो सेक्सुअल ऑर्गन में पेनेट्रेशन से रिलेटड कम्पल्शन साबित करने की जरूरत नहीं रहेगी।

छेड़छाड़ भी भारी पड़ेगी
जानी मानी वकील रेखा अग्रवाल ने बताया कि मौजूदा कानूनी प्रावधानों के मुताबिक अगर किसी लड़की के साथ कोई छेड़छाड़ करता है या फिर उसके कपड़े फाड़ता है और उसकी इज्जत पर हाथ डालता है, लेकिन रेप नहीं कर पाता है तो मामला छेड़छाड़ तक सीमित रह जाता है और छेड़छाड़ के तहत अधिकतम दो साल की सजा हो सकती है।

रेप की परिभाषा बदले जाने के बाद महिलाओं की इज्जत पर हाथ डालने या फिर उसके कपड़े फाड़ने या फिर अन्य तरह से सेक्सुअल असॉल्ट करने के मामले में आरोपी शिकंजे में आ सकेगा और इस तरह ऐसे अपराधी से ज्यादा असरदार तरीके से निपटा जा सकेगा।

क्राइम अंगेस्ट चाइल्ड भी दायरे में
जेंडर न्यूट्रल किए जाने से बच्चों के साथ दुराचार करने वालों को इस दायरे में लाया जा सकेगा। इस तरह बच्चों के खिलाफ सेक्सुअल क्राइम पर भी रोक लग सकेगी। अभी रेप की परिभाषा में महिला की मर्जी के खिलाफ सेक्सुअल ऑर्गन पेनेट्रेशन की बात साबित करना जरूरी है, इसलिए ओरल सेक्स या फिर किसी मेल चाइल्ड के साथ दुराचार करने या इसकी कोशिश करने वाले कानूनी प्रावधान की आड़ में बच निकलते थे। सरकार रेप शब्द की परिभाषा में जो बदलाव ला रही है और नई परिभाषा में सेक्शुअल ऑर्गन पेनेट्रेशन की कम्पल्शन अगर खत्म होती है तो कानून बेहद प्रभावी होगा।

मिलेगीसख्तसजा
अग्रवाल के मुताबिक अगर किसी महिला के साथ छेड़छाड़ होती है, सरेआम उसके कपड़े फाड़े जाते हैं या फिर रेप (सेक्सुअल ऑर्गन पेनेट्रेशन) करने की कोशिश की जाती है तो यह अपराध रेप से भी ज्यादा भयानक है। लेकिन मौजूदा कानून के तहत उसे रेप नहीं माना जाता। सेक्सुअल असॉल्ट शब्द का इस्तेमाल होने से ऐसे अपराध करने वाले भी शिकंजे में आ सकेंगे और उन्हें सख्त सजा मिलेगी। साथ ही जेंडर न्यूट्रल होने से पीडि़त पुरुष भी ऐसे मामले में शिकायत कर सकते हैं। इसके अलावा होमो सेक्सुअल्टी के मामले में अगर रजामंदी के बिना जबरन कोई रिलेशन बनाता है तो वह भी इस कानून के दायरे में आएगा।
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ये कैसा प्रेम, 11 साल की बेटी का रेप करवा डाला
स्तब्ध कर देने वाली एक घटना के तहत तमिलनाडु के मदुरै में 11 साल की एक लड़की का उसकी मां की सहमति से एक व्यक्ति ने बलात्कार किया। लड़की की मां को गिरफ्तार कर लिया गया है।

पुलिस ने रविवार को मदुरै में बताया कि यह घटना तब सामने आयी जब सरकारी राजाजी अस्पताल के डाक्टरों ने उसका परीक्षण किया।

पुलिस को सूचना दी गयी कि यह यौन शोषण का मामला है और लड़की के पिता की शिकायत पर उसकी मां को गिरफ्तार किया गया।

सक्किमंगलम में महिला ने कथित रूप से अपने प्रेमी रवि को 15 जून को इस लड़की का बलात्कार करने पर सहमति दी थी।


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बेटी

बेटियां पैदा होते ही अपने छोटे नाज़ुक कान्हों पर समाज के द्वारा बनाये गए अनगिनत बोझ को उठा लेती हैं। जैसे-जैसे समझदारी बढती जाती है, उनको इन बोझों के विभिन्न नाम बताये जाते हैं। उन्हें खुद अपनी मर्यादाएं समझ में आने लगती हैं। उनको भले ही कहा जाये की वो स्वतंत्र हैं, परन्तु बंदिशों का एहसास करवाया जाता है। मैं यह नहीं कहती की सब उनके बुरे के लिए किया जाता है, बेशक इसमें उनकी भलाई भी छुपी होती है। परन्तु एक बेटी के इस बात का दर बैठ जाता है कि कहीं उससे कोई गलती न हो जाये।
यदि बेटा किसी लड़की से बात करे तो चलता है, पर बेटी किसी लड़के से बात करे तो खलता है। बेटा गलती से कुछ गलत बोल दे तो, अभी बच्चा है सिख जायेगा धीरे धीरे। पर बेटी से ऐसी गलती हो जाये तो उसे शब्दों की सीमायें याद दिला दी जाती हैं।
एक बेटी के साथ घर का सम्मान, प्रतिष्ठा, इज्ज़त और न जाने क्या क्या जुदा होता है। इसमें कुछ गलत नहीं, बल्कि यह बेटे के भी साथ जुड़ा होता है पर शायद बेटियों के मामले में इनका वज़न कुछ ज्यादा ही होता है।
बेटियों को हर एक यह कर उठाना पड़ता है की कहीं समाज के उसूल न टूट जाये। बोला जाता है कि गलती से ही इंसान सीखता है, पर बेटियों को तो गलती करने की इजाज़त ही नहीं। उन्हें तो हर चीज़ में भगवान् के घर से पी एच डी किया हुआ समझा जाता है।
क्या वे इंसान नहीं? क्या उन्हें अपनी गलतियों से सीख पाकर आगे बढ़ने का हक़ नहीं? क्यूँ उन्हें बार-बार याद दिलाया जाता है की वे लड़की हैं? इतने सरे बोझ और बंदिशों के साथ वे इस पापी दुनियां में पैदा होती हैं और उन्हें कहा जाता है कि वे स्वतंत्र हैं। बेटियों को तो बेफिक्र साँस लेने की भी इजाज़त नहीं।
अपने नाज़ुक कन्धों पर इस ढोंगी समाज के वज़न को उठा कर वे जीती हैं और उन्हीं बेटियों को आज बोझ समझा जाता है। उनकी ही जन्म से पहले हत्या कर दी जाती है।
शय ये समाज डरता है कि पता नहीं पिया होने वाली बेटी में हमारे द्वारा रचे पाखंड में जीनें की क्षमता है कि नहीं। हमारे द्वारा पैदा किये गए काँटों में वो अपने नाज़ुक पैरों से कहाँ चल पायेगी। हर कदम पर तो हमने उसके लिए परीक्षा राखी है, कभी न कभी तो फेल होगी ही और तब हम उसे ताने मरेंगे। इतनी कठिन डगर में बेटियां कहाँ चल पाएंगी, चलो पैदा होने से पहले ही उसे मार देते हैं।
पर शायद ये समाज भूल चूका है की बेटियों का जन्म नहीं अवतार होता है। उसकी प्यारी सी एक मुस्कान हजारों अंगारों की भड़की आग भी बुझा देती है। अपने नाज़ुक कन्धों पर समाज के भरी से भरी वज़न को फूल की भांति उठा कर अपनी पायल की आवाज़ पर माकन को घर बना देती है। वो कमज़ोर दिखती है परन्तु उसके जैसी ताकत दुनिया के किसी पुरुष में नहीं।
यह समाज पुरुषत्व की बात करता है, जिस दिन इसने नारित्वा का अर्थ समझ लिया उस दिन इस अर्थहीन समाज का अर्थ निकल आएगा।
इस समाज से एक बेटी का आग्रह है कि अपने पाखंड को त्याग दीजिये। इस आडम्बर में इश्वर की रची सबसे खुबसूरत रचना 'बेटियां' कुचली जा रही हैं। अपने मापदंडों को बदलिए। सिर्फ बेटे-बेटियों को समान कह देने से कुछ नहीं होगा। अपने अंतर्मन से जब तक आप यह नहीं स्वीकारेंगे तब तक ये बेटियां ऐसे ही अथाह पीड़ा के साथ मुस्कुरायेंगी, परन्तु मन ही मन उनके आंसू बहते रहेंगे।
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उदासी से मुक्ति दिला सकती है आयरन की गोलियां

 

मल्टिटास्किंग का अर्थ किसी महिला से बेहतर कोई नहीं जानता



आज  सुपर मॉम सरीखा फैशनेबल शब्द औरतों को कैसे नए तरह से गुलाम बना रहा है, ये वही समझ रही हैं।

वह घर में होती है तो दफ्तर के छूटे हुए काम याद आते हैं। दफ्तर जाती है तो याद आता है कि बच्चे का होमवर्क ठीक से नहीं करा पाई। घर पहुंचते ही उसकी बाट जोहती वॉशिंग मशीन उम्मीद करती है कि स्विच ऑन किया जाए, बर्तनों से भरा सिंक और बिखरा पड़ा किचन दिन भर का उलाहना देता है और बच्चे-बूढ़े शाम के नाश्ते की फ़रमाइश करते मिलते हैं....। कहां से शुरू करे....।

हालत यह होती है कि नींद में भी वह कई बार जागती है और उसे काम के ही सपने आते हैं। एक समय के बाद तनाव, सिरदर्द, थकान इस सुपर मॉम की स्थायी समस्या हो जाती है। यह स्थिति बताती है कि वह अब सुपर मॉम सिंड्रोम से पूरी तरह ग्रस्त हो चुकी है। दबाव, तनाव, बेचैनी, अनिद्रा, अवसाद, निराशा, अकेलापन....ये कुछ लक्षण हैं इस सिंड्रोम के।
लेकिन क्या ये परेशानियां स्त्रियों के लिए संकेत हैं कि उन्हें बाहर नहीं निकलना चाहिए, घर की जिम्मेदारियों को अच्छी तरह निभाना चाहिए? यह तो फिर से वापस लौटने की तरह होगा। आत्मनिर्भरता की जिस लड़ाई में ये इतना आगे तक बढ़ चुकी हैं क्या उन्हें फिर से पीछे जाना होगा? माना कि उन पर कई तरह के दबाव हैं, वे एक संक्रमण-काल से गुजर रही हैं, लेकिन इसका अर्थ यह कदापि नहीं है कि वे बाहर नहीं निकलना चाहतीं। उन्हें सिर्फ घर और कार्यस्थल का माहौल अपने अनुकूल चाहिए, जो अभी संभव नहीं हो पा रहा है। समस्या की जड़ यही है।

परिवारों का ढांचा परंपरागत है और बाहरी दुनिया में अभी उनकी कामकाजी छवि को लोग मन से स्वीकार नहीं पा रहे हैं। ख़ुद स्त्रियों को भी मानना होगा कि वे हर जगह पर्फेक्ट नहीं हो सकतीं। अगर बच्चों को मनचाहा समय नहीं दे पा रही हैं तो इसमें ग्लानि क्यों? जितना भी समय दे रही हैं-उसे भरपूर देने की कोशिश तो कर रही हैं। पर्फेक्ट कुक नहीं हैं तो क्यों अपने हाथों को लानत भेजें, दफ्तर में तो कुछ अच्छे प्रोजेक्ट्स तैयार कर रही हैं।

इस सिंड्रोम से बचने का एक ही रास्ता है-थोड़ा सा समय। यह थोड़ा सा समय जिसमें स्त्री ख़ुद के लिए कुछ करे। ख़ुद को अच्छा लगने के लिए कुछ करे। डांस करे, गुनगुनाए, एक्सर्साइज़ करे, वॉक करे, पेंटिंग करे....। हर काम के लिए समय निकाल रहे हैं तो थोड़े से पल अपने लिए निकालने में कंजूसी या अपराधबोध क्यों हो?

सबसे बड़ी चीज है प्राथमिकता तय करना, बच्चे छोटे हैं तो घर के कोने-कोने की सफाई से ज्यादा जरूरी है बच्चों को समय देना। स्वास्थ्य खराब है तो भी दूसरों की सेवा-टहल करते रहने के बजाय खुद को डॉक्टर को दिखाना ज्यादा जरूरी होना चाहिए। बच्चे को हर सुविधा देना क्यों जरूरी है? उनके खराब मार्क्स आने या घरेलू अव्यवस्थाओं के लिए वे खुद को ही दोषी क्यों समझें? किसी भी स्त्री के लिए यह याद रखना जरूरी है कि वह पत्नी, बहू या मां होने से पहले एक इंसान हैं और उसे भी एक इंसान की तरह जीने का हक भी है। खुद को मशीन न मानें। खुद को दूसरे की नजर में अच्छा बनाने से पहले अपनी नजर में अच्छी बनें। हर काम में पर्फेक्ट होना इतना भी जरूरी नहीं कि उसके लिए जिंदगी दांव पर लगा दी जाए।

ये सारे काम किए जा सकते हैं लेकिन ये सारे काम एक साथ नहीं किए जा सकते। स्त्री किसी परिवार का दिल है और इस दिल को हमेशा धड़कते रहने के लिए उसका सिर्फ मां होना काफी है, उसे सुपर मॉम या पर्फेक्ट मॉम बनने की कोशिश करने की जरूरत नहीं।

पहले MMS, फिर बीवी बनाया, फिर 

तेजाबमाल्दा में एक पति का अपनी पत्नी पर तेजाब डालने और फिर उसे तेजाब पिलाने का दरिंदगी भरा मामला सामने आया है। पत्नी हॉस्पिटल में जिन्दगी के लिए लड़ाई लड़ रही है और पति लापता है। दरअसल, यह केस अपने आप में शुरू से ही पति की एक के बाद एक शर्मनाक हरकत की कहानी बयां करता है।

हबीबपुर पुलिस स्टेशन के तहत आने वाले ऋषिपुर गांव का सुजॉय सरकार अपनी पत्नी को नापसंद करता था। दहेज के लालच में वह पत्नी को लगातार टॉर्चर करता। उसे यह शादी गांव वालों के दबाव के चलते करनी पड़ी थी।

सूत्रों का कहना है कि 22 साल की पीड़ित सुजॉय को पसंद करती थी। सुजोय ने इस बात का फायदा उठाकर न सिर्फ लड़की को झांसा दिया और शारीरिक संबंध बनाए बल्कि उसका एमएमएस भी बना लिया जिसे वह खुद ही सर्कुलेट भी करने लगा। परिवार वालों के इस बाबत पंचायत में जाने के बाद कोर्ट ने दोनों की शादी का निर्देश दिया। 6 महीने पहले दोनों की शादी हो गई थी।

हाल ही में उसने पत्नी के मायके वालों से 80 हजार रुपए और मोटरसाइकल मांगी लेकिन गरीब किसान परिवार उसकी यह डिमांड पूरी नहीं कर पा रहा था। उस दिन पत्नी ने सुजॉय का विरोध किया तो गुस्से में सुजॉय ने उसके चेहरे को एसिड से नहला दिया और एसिड पीने पर मजबूर किया।
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दहेज के लिए हर किसी से रेप का शिकार हुई युवती

मध्य प्रदेश के सागर जिले में दहेज की मांग पूरी न कर पाने के कारण एक 20 साल की युवती को ससुरालवालों के जुल्म का शिकार होना पड़ा। पिछले तीन साल से महिला को तबेले में जंजीरों से बांध कर रखा गया। इतना ही नहीं, इस दौरान उसके पति, रिश्तेदारों और यहां तक कि पड़ोसियों ने बार-बार उसके साथ बलात्कार किया।


युवती पर जुल्म की इंतहा यह थी कि तीन सालों तक उसका रेप किया गया। इस साल मई में 50 हजार रुपये के लिए उसे एक महाजन को बेच दिया गया। सिर्फ इसलिए क्योंकि उसके परिवारवालों के पास दहेज देने के लिए पैसे नहीं थे। युवती एक बार काफी बीमार हो गई, उस वक्त एक पड़ोसी उसे अस्पताल ले गया, लेकिन उसने भी अस्पताल ले जाते समय कथित तौर पर उसका रेप किया। युवती के साथ हुए इस बर्बर व्यवहार का उस समय पता चला, जब उसके एक रिश्तेदार ने सौभाग्य से उसे महाजन के घर पर देख लिया और इस बात की जानकारी उसके परिवारवालों को दी।


1 जुलाई को महिला अपने रिश्तेदारों के साथ राहतगढ़ पुलिस स्टेशन गई और इस अपने ऊपर हुए जुल्म ही यह भयावह कहानी सुनाई। पुलिस अधिकारी एस. पी सागर के अनुसार, महिला की शादी सागर जिले के पराश्री टूंडा गांव के आनंद कुर्मी के साथ पांच साल पहले हुई थी। शादी के कुछ दिन बाद से ही ससुरालवालों ने दहेज के लिए उसे मानसिक और शारीरिक रूप से प्रताड़ित करना शुरू कर दिया।


पीड़िता के किसान पिता रामकिशन ने बताया, 'शादी के समय ससुरालवालों ने एक लाख रुपये की मांग की थी, जो उन्हें दे दिए गए थे। लेकिन वह बार-बार चीजों की मांग करने लगे। उन्होंने कलर टीवी, मोटरसाइकल, ट्रैक्टर के साथ-साथ एक लाख रुपये नकद और मांगे। इसके लिए बार-बार उन्होंने मेरी बेटी के साथ मारपीट की।' रामकिशन ने कहा, जब मेरी बेटी गर्भवती हुई तो सास और परिवार के दूसरे लोगों ने मिलकर जबरन उसका गर्भपात करवा दिया। शादी के दो साल बाद उन लोगों ने कहा कि अब उनकी बेटी वहां नहीं रह सकती।'


इसके बाद ससुरालवालों ने उसे तबेले में गाय-भैसों के साथ जंजीर से बांधकर रखा। कुछ दिन बाद उसका पति आनंद कुर्मी उसे पास के एक गांव खुरई में राम सिंह नाम के अपने रिश्तेदार के यहां छोड़ आया। राम सिंह और उसके बेटों नरेंद्र और लोकेंद्र ने युवती को घर में बंद करके रखा और करीब 20 दिन तक उसके साथ रेप किया।


इसके बाद राम सिंह ने उसे एक दूसरे गांव महुना के महाजन द्वारका प्रसाद को उसे बेच दिया। यहां भी उसके साथ बार-बार रेप किया गया। इस बीच एक दिन महिला काफी बीमार पड़ गई तो महाजन का पड़ोसी खड़ग सिंह उसे अस्पताल ले गया, लेकिन रास्ते में उसने भी उससे रेप किया।


बाद में महाजन के घर लौटते समय महिला को रिश्तेदार ने देख लिया और पहचान लिया। तब जाकर महिला के घरवालों को इसकी जानकारी मिली और किसी तरह उसे वहां से छुड़ाया गया। 28 जून को महिला को छुड़ाकर उसके घर वाले अपने पास ले आए और दो दिन बाद इस मामले की रिपोर्ट पुलिस मे लिखवाई।


पुलिस ने महिला के पति, ससुरालवालों, रेप के दूसरे आरोपियों सहित महाजन के खिलाफ केस दर्ज किया है। फिलहाल पुलिस ने तीन आरोपियों जिसमें युवती के साथ अस्पताल ले जाते समय रेप करने का आरोपी खड़ग सिंह भी शामिल है, को गिरफ्तार किया है।

प्यार की सजा, महिला को सरेआम न्यूड कर पीटा

राजस्थान के उदयपुर में रविवार को जातीय पंचायत की एक वहशियाना हरकत देखने को मिली। जातीय पंचायत ने एक जोड़े को प्यार करने पर ऐसी सजा दी कि तालिबान की याद आ गई। गांव वालों ने प्रेमी जोड़े को पेड़ से बांध दिया। पेड़ से बांधकर पहले इन दोनों की पिटाई की गई और फिर प्रेमी के साथ पूरे गांव के सामने महिला को नंगा किया गया।


युवती की इज्जत को तार-तार करने वाली यह घटना उदयपुर के सराड़ा थाना क्षेत्र स्थित कारोली फला की है। सूचना पाकर मौके पर पहुंची पुलिस को गांव वालों के भारी विरोध का सामना करना पड़ा। गांववालों ने पथराव शुरू कर दिया। जवाब में पुलिस को लाठीचार्ज करना पड़ा, हवाई फायर भी किए गए। बाद में काफी समझाने के बाद पुलिस ने बंधक युवक-युवती को मुक्त कराया।


ग्रामीणों के मुताबिक, युवती विवाहित है और उसपर गांव के ही एक युवक के साथ भागने का आरोप है। पाल सराड़ा गांव के काराकोली फला का रहने वाला एक युवक अपनी पड़ोसी विवाहिता को लेकर 15 दिन पहले भाग गया था। दोनों एक दूसरे से प्रेम करते थे। ग्रामीणों ने अपने स्तर पर खोजबीन की और दोनों को खेरवाड़ा के पास पकड़ कर फिर गांव में लाए। इसके बाद विवाहिता के बाल काट और उसे निर्वस्त्र कर पेड़ से बांध दिया। प्रेमी को भी अलग पेड़ से बांध दिया। दोनों की जमकर पिटाई की गई।

महिला उत्पीड़न के सवाल

महिला आयोग ने घर के भीतर होने वाले महिला उत्पीड़न के जो आंकड़े पेश किए हैं, वे वाकई चिंताजनक हैं। आयोग ने एक महीने के भीतर आई शिकायतों के आधार पर आंकड़े पेश किए हैं। महीने भर में आई कुल शिकायतों में एक सौ छह मामले ऐसे हैं, जिनमें महिलाओं के साथ पतियों ने मारपीट अथवा शारीरिक उत्पीड़न किया है। इसके अलावा सत्ताईस मामले दहेज उत्पीड़न के हैं, जबकि पच्चीस भावनात्मक उत्पीड़न के। तैंतीस मामले ऐसे हैं, जिनमें ऐसे नजदीकी रिश्तेदारों और पड़़ोसियों ने उत्पीड़न किया है, जिन पर महिलाएं विश्वास करती थीं। इन उत्पीड़नकारियों की फेहरिश्त में पुलिस भी शामिल है, जो महिलाओं की शिकायतों पर गौर तो नहीं करती, उल्टे उन्हें अपमानित करती है। यह हाल देश की राजधानी का है, तो बाकी देश में क्या हाल होगा, इसका अंदाजा लगाया जा सकता है।
महिलाओं को सुरक्षा और न्याय दिला पाने का पुलिस का रिकार्ड तो जगजाहिर है। दो दिन पहले का ही मामला है, जब एक लड़की ने थाने में जाकर शिकायत की, कि उसके शिक्षक ने तीन साल तक बहला-फुसलाकर उसका शारीरिक शोषण किया और जब उसने शादी की बात कही तो वह मुकर गया। पुलिस ने लड़की को थाने से भगा दिया और आरोपी शिक्षक की आवभगत की। इस बर्ताव से आहत लड़की ने जहरीला पदार्थ पीकर खुदकु्शी कर ली।
सवाल यह है कि जब हम ही अपनी ही घर की महिलाओं को भावनात्मक और शारीरिक सुरक्षा नहीं दे पा रहे, तो पुलिस यह सब क्यों करने लगी? समय-समय पर बलात्कार जैसी घटनाओं के लिए महिलाओं को ही जिम्मेदार ठहराकर पुलिस महिला सुरक्षा के प्रति अपनी संवेदनशीलता और सोच का प्रमाण देती रहती है कि बलात्कार की घटनाओं के लिए खुद महिलाएं और उनका पहनावा जिम्मेदार है। या फिर, रात को घर से बाहर निकलकर, भड़कीले वस्त्र पहनकर वे खुद ऐसी घटनाओं को आमंत्रित करती हैं आदि। आखिर पुलिस और प्रशासन में तैनात लोग भी इसी समाज के तो हिस्से हैं, जहां लोग दहेज पाने जैसी कुत्सित बातों के लिए अपनी ही औरतों को न सिर्फ प्रताडि़त करते हैं, बल्कि उनकी जान तक ले लेते हैं!
पिछले सप्ताह गुड़गांव में एक साल की बच्ची की मां ने बहुमंजिला इमारत की खिड़की से कूद कर जान दे दी, क्योंकि उसका पति चाह रहा था कि पत्नी उसके बिजनेस शुरू करने के लिए अपने मायके से दस लाख रुपये लाकर दे। महिला इस बात से इन्कार कर रही थी और पति इस बात के उससे झगड़ा कर रहा था। बात इतनी बढ़ गई कि महिला के भाई को बीच-बचाव के लिए आना पड़ा, लेकिन सुलह-समझौता फिर भी नहीं हो सका और जब रात को सभी सो रहे थे, महिला घर की खिड़की से नीचे कूद गई। जाहिर है, परिस्थियां उसे अपने जीने के अनुकूल नहीं लगीं।
इस घटना के मद्देनजर हम विचार करें, तो पाएंगे कि पुलिस या कोई कानून ऐसे मामलों में कुछ खास नहीं कर सकता। महिला की हत्या के लिए जिम्मेदार पति को हम फांसी दे सकते हैं। हो सकता है कि इससे हर व्यक्ति के मन में खौफ भी बैठे, कि अगर वह दहेज के कारण पत्नी की हत्या करेंगे तो फांसी नसीब होगी, लेकिन क्या इससे हर घर में महिलाआंे को वह जरूरी सम्मान मिल सकेगा, जो उसके जीने के लिए जरूरी है।
हमारे समाज में महिलाओं के उत्पीड़न के अलग-अलग रूप हैं, मसलन-दहेज के लिए हत्या, कन्या भ्रूणहत्या, पुरुषोचित भावनात्मकपूर्ति के लिए हत्या या फिर इज्जत के लिए हत्या। यहां तक कि पुरुषों ने युवक-युवतियों के प्रेम संबंधों से अपनी जो इज्जत-आबरू जोड़ रखी है, उसके निशाने पर भी युवतियां ही हैं, क्योंकि कभी किसी ने इज्जत की खातिर अपने बेटे की हत्या नहीं की। लड़के इसका शिकार होते जरूर हैं, लेकिन लगभग मामलों में या तो लड़की की हत्या की जाती है या उससे प्रेम करने वाले लड़के की। कभी ऐसा सुनने में नहीं आया कि किसी बाप ने अपने लड़के की हत्या इस तर्क के साथ की हो, कि उसने किसी लड़की से प्रेम किया और खानदान की इज्जत पर कालिख लग गई। इससे जाहिर है कि पुरुष और स्त्री के लिए हमने समान साध्य के लिए अलग-अलग न सिर्फ नियम बनाए हैं, बल्कि प्राण-पण से उसकी सुरक्षा भी करते हैं।
यही सूरत दहेज को लेकर होने वाली हत्याओं मामले में भी है। कभी कोई हत्या इसलिए नहीं हुई कि पति अपनी पत्नी को जरूरी सुरक्षा या जीने का सामान मुहैया नहीं करा पा रहा था। कोई हत्या इसलिए नहीं हुई कि किसी पत्नी ने पति से लाखों रुपये मांगे और पति नहीं दे सका, तो उसकी हत्या कर दी गई। चूंकि, पति की परिस्थितियों और अमीरी-गरीबी में पत्नी का साथ होना ही उसका धर्म है, लेकिन पति के लिए ऐसा कोई धर्म नहीं बना है कि वह जीवन संगिनी बनने वाली स्त्री से पैसे की मांग न करे और वह जैसी भी, जिस भी हैसियत की है, उसके साथ निबाहे। यहां तक कि विवाह के कई-कई साल बाद भी पति और ससुराल पक्ष के लोग महिलाओं पर दबाव डालते हैं कि वह मायके से दहेज की मांग करे। जबकि, हम यह कभी नहीं चाहते कि हमारी अपनी बच्ची के साथ ऐसा कुछ हो।
साफ है कि महिलाओं के प्रति हिंसा व्यवस्थागत या कानूनी खामी के कारण नहीं है। यह हिंसा हमारे सामाजिक ढांचे और गैर-बराबरी की सोच में निहित है। हमने महिलाओं और पुरुषों के लिए अलग-अलग मानक तय किए हैं। हम अपनी लड़की पर हुए अत्याचार पर उद्वेलित होते हैं, लेकिन बहू से पैसे की मांग करते हैं और नहीं देने पर उसके साथ पशुता से पेश आते हैं। हम बेटी को कम से कम देना चाहते हैं, लेकिन बहू से ज्यादा से ज्यादा लेना चाहते हैं। यदि बहू पक्ष थोड़े से दबाव में ऐसा नहीं करता तो हम बहुओं को उसकी सजा देते हैं। यह लेनदेन का गणित जब तक बेटी और बेटे के अस्तित्व से जुड़ा रहेगा, यह समस्या बनी रहेगी। अगर हम चाहते हैं कि दहेज के लिए हमारी बेटी की हत्या न हो, तो हमे इस घृणित प्रथा को समूल मिटाना होगा। हमें दहेज न लेकर महिलाओं के व्यक्तित्व को मान्यता देनी होगी, मगर इसकी शुरुआत कौन करेगा?

छेड़छाड़ का केस वापस नहीं लिया तो मार दी गोली

 दिल्ली में बदमाशों ने छेड़छाड़ का केस वापस न लेने पर महिला को गोली मार दी। गोली महिला के पैर में लगी है और फिलहाल वह खतरे से बाहर है। पुलिस ने गोली चलाने वाले एक बदमाश को गिरफ्तार कर लिया है जबकि बाकी आरोपियों की तलाश की जा रही है।


गोली का निशाना बनी इस महिला ने अपने पड़ोस में रहने वाले कुछ युवकों के खिलाफ छेड़छाड़ और मारपीट की शिकायत दर्ज कराई थी। पुलिस ने इस मामले में 2 आरोपियों को गिरफ्तार भी किया था। तब से लेकर लगातार इस महिला को केस वापस लेने के लिए धमकियां मिल रही थीं। जब महिला ने केस वापस नहीं लिया तो इन बदमाशों ने उसे गोली मार दी।


रोहिणी के पास बुद्ध विहार फेज़-1 में रहने वाली अनुष्का (बदला हुआ नाम) पति से तलाक लेने के बाद अपने मायके में रहती हैं। सोमवार को करीब 4 बजे जब वह सामान खरीदने बाजार जा रही थीं, तभी बदमाशों ने उनपर गोली चला दी। संयोग से गोली उनके बाएं पैर की एड़ी में लगी। फायर करते ही हमलावर मौके से फरार हो गए।

महिलाओं का रिमोट कंट्रोल


जब से नारी जाति में शिक्षा के प्रति जागरूकता आई है और उसने अपने मुबारक कदम अपनी घर की दहलीज से बाहर निकाले है उसके बाद से ही उसका ज्यादातर रिमोट पुरुषों ने अपने हाथ में रखने की कोशिश की है तो किन्ही विशेष परिस्थितियों में उसने खुद ही पुरुषों के हाथ में चाहे और अनचाहे , अनजाने में ही अपना रिमोट सिस्टम सौंप दिया है …..
अपने नम्बर बढ़वाने + पास करवाने की ऐवज में कभी भूले भटके वोह खुद ही , और ज्यादातर मामलों में जबरन उसका रिमोट कलियुगी शिक्षकों द्वारा अपने हाथ में ले लिया जाता है ….. उसके बाद नौकरी का नियुक्ति पत्र पाने + तरक्की पाने के लिए भी महिलाए अपना रिमोट पुरुषों के हाथ में स्वेच्छा से देती रही है ….. रिशेप्शनिस्ट तथा पर्सनल सेक्रटरी की पोस्ट पर कार्यरत महिलाओं से तो यह आशा हर हाल में की ही जाती है + रखी जाती है की वोह अपने बॉस के रंग में रंग कर उसकी चहेती बन कर दिखलाये …..
महिलाएं किसी भी क्षेत्र में चली जाए बस उनसे एक ही आशा रखी जाती है और बस एक ही अपेक्षा की जाती है ….. महिलाए किसी भी जगह पर सुरक्षित नहीं है यहाँ तक की धार्मिक स्थलों पर भी धर्म के ठेकेदारों ने धार्मिक स्थलो की मान मर्यादा को बार बार भंग किया है तथा वहां पर भी औरतों की इज्जत को तार तार किया है ….. दुःख की बात है की किसी भी धर्म के धार्मिक स्थान इन कामो से अछूते नहीं है , और आजकल के आधुनिक ढ़ोंगी और पाखण्डी बाबाओं के तो कहने ही क्या ?….. शिकायत मिलने पर इनके डेरों से अक्सर ही छापामारी में अश्लील सामग्री के साथ साथ लड़किया मिल जाती है जिनकी आत्मा तक का कंट्रोल स्वामी जी के हाथ में पकडे अद्रश्य रिमोट में समाया होता है …..
और अगर हम राजनीति की बात करे तो इसके बारे में एक बड़ी ही मशहूर कहावत है की "लुच्चा लफंगा चौधरी और बदनाम औरत प्रधान" ….. इस क्षेत्र में कोई विरली ही महिला होगी जिसका की रिमोट किसी नेता के हाथ में ना हो …. आप सोचते होंगे की सब कुछ पता होते हुए भी औरते इस क्षेत्र में अपनी किस्मत क्यों आजमाती है ….. इस फील्ड में पैसा + शोहरत और सत्ता का आकर्षण इनको अपनी तरफ खींचता है ….. लेकिन अपने अकेली के बलबूते भी शायद ही किसी ने राजनीती में प्रवेश किया हो + पैर रख कर अपना मुकाम बनाया हो ममता दीदी की तरह ….. उनको शुरुआत में या फिर बाद में किसी ना किसी पुरुष का सहारा लेना ही पड़ता है कुमारी जयललिता और कुमारी मायावती की तरह ….. और इस फील्ड के यह घाघ नेता इनका क्या हश्र करते है यह खुद इनके इलावा कोई भी नहीं जानता …..
राजनीति के बाद बात आती है माडलिंग तथा फ़िल्मों से जुड़े हुए क्षेत्र की ….. इसमें नारी कितनी सुरक्षित है यह किसी से कहने या बताने की जरूरत नहीं है ….. लेकिन यहाँ पर उसका रिमोट अलग अलग समय में अलग -२ पुरुषों के हाथो में बदलता रहता है ….. बड़े पर्दे पर दिखने की चाहत की बात तो रहने दीजिए हमारे बुद्धू बक्से में प्रसारित होने वाले धारावाहिकों में भी रोल देने के नाम पर पर्दे के पीछे बहुत कुछ होता है …..
इसके बाद बारी आती है जबरन वैश्याव्रती के धन्धे में धकेल दी गई महिलायों की …. अपने पिछले जन्म के पापों की सज़ा भुगत रही उन बेचारियों के एक ही समय में अनेको हाथों में रिमोट कंट्रोल रहते है जैसे की कोठे वाली बाई और दलाल वगैरह तथा इस पेशे से जुड़े हुए गुंडों के हाथों में …. लेकिन आजकल की आधुनिक हाई फाई सोसाइटी की देन कालगर्ल देखने में चाहे अपनी मर्जी से इस धन्धे में आई हुई दिखती हो लेकिन असल में उसका रिमोट भी किसी ना किसी रूप में किसी पुरुष के हाथ में ही होता है | जब इस प्रकार की खबरों को की शादी / नौकरी का झांसा देकर शारीरिक शोषण / बलात्कार करता रहा|
लेकिन शादी के नाम पर अपने जिस्म और रूह का रिमोट कंट्रोल पराये पुरुष को देने
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खाने के बदले विदेशियों ने बनाई न्यूड फिल्म!

रोहतक के प्रोटेक्शन होम में महिलाओं के यौन शोषण का सनसनीखेज खुलासा हुआ है। प्रोटेक्शन होम में रहने वाली महिलाओं ने आरोप लगाया है कि अक्सर यहां विदेशी नागरिक आते थे और उनकी नंगी तस्वीरें उतारते थे।आरोप गंभीर हैं लेकिन केस दर्ज करने के लिए पुख्ता सबूतों की जरूरत है।

एनजीओ भारत विकास संघ प्रोटेक्शन होम का संचालन करता है। मई में बाल कल्याण संरक्षण के राष्ट्रीय आयोग ने एनजीओ के दफ्तर पर छापा मारा था। एनसीपीसीआर ने 9 मई को प्रोटेक्शन होम से 10 से 15 की उम्र के 90 नाबालिक को छुड़ाया था। होम की मालकिन जसवंती देवी पर इममोरल ट्रैफिकिंग,प्रताड़ना और बंधुआ मजदूरी को प्रोत्साहित करने का केस दर्ज किया गया था।

हरियाणा और पंजाब हाईकोर्ट की ओर से गठित चार सदस्यीय टीम के सामने महिलाओं ने बताया कि मुंबई से आए विदेशी नागरिकों ने उनकी नंगी तस्वीरें उतारी थी। उन्होंने अच्छा खाना और अच्छे कपड़े देने का लालच देकर नंगी फिल्में उतारी थी। जसवंती देवी का दामाद जय भगवान लड़कियों को विदेशियों के आने से पहले सूचित करता था। विदेशी मेहमानों की यहां खूब आवभगत होती थी।

ये खुलासे चौंकाने वाले हैं। जांच रिपोर्ट कोर्ट के सामने पेश किए जाने के बाद ही पूरे मामले से पर्दा हटेगा। अगर मामले की जांच हरियाणा से बाहर की किसी स्वतंत्र एजेंसी से कराई जाती तो पीडितों को न्याय मिलने की ज्यादा गुंजाइश है।

सूत्रों के मुताबिक विदेशी लोगों के खिलाफ आरोपों की बात जसवंती देवी से पूछताछ के दौरान भी सामने आई थी। आरोप है कि प्रोटेक्शन होम में रहने वाली लड़कियों को चंडीगढ़ में आला अधिकारियों के यहां होने वाली आलीशान बर्थडे पार्टियों में ले जाया जाता था। 18 साल से अधिक उम्र की लड़कियों को पैसे लेकर उम्र दराज लोगों से जबरन शादियां करा दी जाती थीं।
बच्चों से कराते थे न्यूड योगा,ओरल सेक्स
हरियाणा के रोहतक का अपना घर अय्याशी का अड्डा बना हुआ था। यहां पांच से 10 साल के बच्चों से न्यूड योगा और ओरल सेक्स कराया जाता था। अपना घर की संचालिका जसवंती देवी का दामाद जय भगवान सिंह और ड्राइवर सतीश बच्चों को यह सब करने के लिए मजबूत करते थे। सतीश न्यूड योगा करते हुए फिल्म उतारता था। यही नहीं लड़कियों के गर्भवती होने पर उनका गर्भपात करा दिया जाता था। यहां रहने वाली एक महिला को तो एड्स से ग्रसित पाया गया है।

शादी की नौटंकी और सेक्स

लड़कियों को यह कहते हुए पुरूषों के गले में माला पहनाने के लिए मजबूर किया जाता था कि तुम्हारी शादी हो गई है। इसके बाद उन्हें शारीरिक संबंध बनाने के लिए कहा जाता था। रिपोर्ट के अनुसार अपना घर से दूसरी जगह शिप्ट की गई महिला को एचआईवी पोजिटीव पाया गया है। जसवंती देवी ने एक गूंगी और बहरी बच्ची को तीन बार बेचा था। एक अन्य बच्ची प्रेगनेंट हो गई थी। गौरतलब है कि हाल ही में राष्ट्रीय बाल संरक्षण आयोग ने हाल ही में अपना घर पर छापा मारा था।

नशा देकर होता था यौन शोषण
लड़कियों को टूथपाउडर के नाम पर दिया जाने वाला सफेद पाउडर नशा था जिसका इस्तेमाल लड़कियों के यौन उत्पीड़न के लिए किया जा रहा था। यही नहीं छोटे बच्चों को मंदिरों में चोरी करने के लिए इस्तेमाल किया जा रहा था और इसके लिए उन्हें गंजा करके रखा जाता था। रिपोर्ट में बताया गया कि करनाल के नारी निकेतन में रहने वाली पांच लड़कियों ने कमेटी के समक्ष शारीरिक उत्पीड़न की शिकायत की।

लड़कियों ने कहा कि उन्हें जबरन गोलियां खिलाकर उनका गर्भपात कराया गया। पानीपत स्थित मदर टेरेसा मिशनरी ऑफ चेरेटी में रहने वालों की हालत तो ऎसी थी कि वे अपनी शिकायत भी नहीं बता पाए। उन्हें देखकर अंदाजा लगाया जा सकता था कि बच्चे नशे की हालत में हैं।

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नाबालिग प्लेयर का आरोप, पैरंट्स कराते थे वेश्यावृत्ति

नैशनल लेवल की नाबालिग खिलाड़ी से जबरन वेश्यावृत्ति कराने का मामला सामने आया है। पीड़िता का आरोप है कि उसके माता - पिता ही उससे जबरन देह व्यापार कराते थे। विरोध करने पर जान से मारने की धमकी दी जाती थी। मौका पाकर वह मौसी के घर आई और तब जाकर पूरे मामले का खुलासा हो पाया। मौसी की पहल पर एसपी ने इसकी जांच के आदेश दिए हैं। अभी उसे एक एनजीओ में रखा गया है।


महम , रोहतक की रहने वाली नैशनल किक बॉक्सिंग की खिलाड़ी ने आरोप लगाया कि उसके माता - पिता और परिवार के अन्य लोग उससे जबरन वेश्यावृत्ति कराते थे। इस घिनौने खेल में कई हाई प्रोफाइल लोग भी संलिप्त हैं। शोषण करते समय उसकी आंखों पर काली पट्टी बांध दी जाती थी। विरोध करने पर परिवार के लोग उसे जान से मारने की धमकी देते थे। करीब चार साल से लगातार उसका शारीरिक शोषण किया जा रहा है। उसने बताया कि एक दिन मौका पाकर वह अपने घर से भाग निकली और सीधे रेवाड़ी में रहने वाली मौसी के पास आ गई। उसने मौसी को पूरी आपबीती बताई। इसे सुनकर उसकी मौसी भी सकते में आ गई।


उसने बताया कि उसकी मौसी उसे लेकर जिला बाल संरक्षण अधिकारी संतोष अलाहवादी के पास आई। उन्होंने उसकी कहानी सुनी तो वह भी दंग रह गईं। उसे तत्काल आस्था कुंज में भर्ती करवा दिया और इस पूरे घटना क्रम से जिले के एसपी अभिषेक गर्ग को अवगत कराया। गर्ग ने मामले की गंभीरता को देखते हुए तुरंत मॉडल टाउन थाने को इसकी गहराई से जांच करने के आदेश दिए। महम की रहने वाली खिलाड़ी 27 मई को संदिग्ध हालत में अपने घर से गायब हो गई थी। इस बारे में रोहतक पुलिस को सूचना दे दी गई थी। 
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  बीवी ने सेक्स नहीं किया तो दे दिया तलाक 


मुंबई में एक शादी इसलिए टूट गई क्योंकि बीवी सेक्स नहीं कर पा रही थी। जोगेश्वरी के रहने वाले 47 वर्षीय अनंत पाटिल (परिवर्तित नाम) ने अपनी पत्नी अमिषा पटेल(परिवर्तित नाम) से 1 जून 2012 को तलाक लिया है। दोनों की शादी दस जुलाई 2005 को हुई थी। शादी के कुछ समय तक तो सब ठीक ठाक था लेकिन कुछ वक्त बाद अनंत को लगा कि अमीषा का बर्ताव असामान्य है।


पाटिल का कहना है कि शादी के वक्त उन्हें यह नहीं बताया गया था कि अमीषा कथित रूप से मानसिक रूप से बीमार है। शादी के बाद अमीषा हमेशा बीमार रहने लगी। वह नियमित रूप से अपने फैमिली डॉक्टर के पास जाती थी। डॉक्टर अमीषा को जो दवाएं लिख रहे थे,उनके अलावा भी वह अन्य दवाएं ले रही थी।


12 अगस्त 2006 को अमीषा अपने गहने लेकर अनंत पाटिल का घर छोड़कर चली गई। तीन साल बाद 10 सितंबर 2009 को अमीषा वापस घर आ गई। उस समय अमीषा ने अनंत को डॉक्टर की एक चिट्ठी पकड़ाई। अमीषा ने स्वीकार किया कि वह 2002 से नींद की गोलियां ले रही थी। इसके बाद अनंत ने कोर्ट में तलाक की अर्जी दायर कर दी। अर्जी में बताया कि अमीषा के परिवार ने जानबूझकर उन्हें और उनके परिवार को यह बात नहीं बताई। इसके बाद अनंत ने कोर्ट में तलाक के लिए अर्जी दी। दोनों की बांद्रा के फैमिली कोर्ट में काउंसलिंग हुई लेकिन दोनों की शादी नहीं बच पाई। अनंत ने कोर्ट में कहा कि अमीषा सेक्स नहीं कर पाती थी।

50 हजार के बदले 90 दिन तक रेप


प्यार के नाम पर 90 दिन तक एक लड़की की इज्जत से हो रहे खिलवाड़ से पर्दा उठाया है। मामला यहां के बसंतसुर थाने इलाके का है, जहां एक युवक ने अपनी गर्लफ्रेंड को महज 50 हजार में बेच दिया। खरीददार एक ऑर्केस्टरा संचालक है, जिसपर पिछले तीन महीने से लड़की के साथ ज्यादती के आरोप लगे हैं।

जानकार के अनुसार मुख्य आरोपी युवक ने अपनी गर्लफ्रेंड को प्यार का झांसा देकर घर से भगाया और आर्केस्ट्रा संचालक को बेच दिया। खरीददार संचालक पर पीडित युवती से 3 महीने तक शारीरिक और मानसिक रूप से प्रताडित करने आरोप लगे हैं। सूत्रों के अनुसार प्रेमी पर भरोसा करना इस युवती इतना महंगा पड़ा कि अपनी इज्ज्त से हाथ धो बैठी। बॉयफ्रेंड के हाथों बिकने के बाद वह लगभग तीन महीने तक ज्यादती बर्दास्त करती रही।
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गैंग रेप की सजा 10 हजार रूपए
 

लखनऊ। उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर जनपद तिलहर थाना क्षेत्र में अपहरण के बाद गैंगरेप की शिकार हुई किशोरी ने खुद पर मिट्टी का तेल उड़ेलकर आग लगा ली। उसकी बरेली जिला अस्पताल में उपचार के दौरान मौत हो गई। उसने यह कदम पंचायत द्वारा आबरू की कीमत दस हजार लगाने और अपना मुंह बंद रखने का फैसला सुनाने के बाद उठाया।

यह वारदात तिलहर थाना क्षेत्र के गांव पिपरौली की है। गांव निवासी कृष्णपाल की तीन साल पहले मौत हो चुकी है। उसकी मौत के बाद एक बेटे व तीन बेटियों के पालन- पोषण की जिम्मेदारी उसकी पत्नी बिटोली के कंधों पर आ गई। उसकी बड़ी बेटी सोनी (17) की हो गई थी। सोनी की दोनों बहनें उससे छोटी हैं और भाई सबसे बड़ा है। सोनी घर के पीछे खेत में शौच के लिए गई थी, तभी गांव के दो युवक तमंचों के बल पर मुंह में कपड़ा ठूंसकर उसे उठा ले गए और रातभर उसके साथ दुराचार किया।


उधर, परिजन और गांव के लोग सोनी को सारी रात तलाशते रहे। दोनों युवकों ने सुबह करीब पांच बजे सोनी को छोड़ दिया। सोनी ने घर पहंुच कर मां को घटना की जानकारी दी। चूंकि आरोपित युवक व सोनी एक ही जाति के हैं। इसलिए मामले से पुलिस को दूर रखने के लिए पंचायत बुलाई गई। सुबह-सुबह गांव के कुछ दबंगों की मौजूदगी में हुई पंचायत ने सोनी की आबरू की कीमत दस हजार लगाई। पंचायत ने कहा कि दोनों युवकों से सोनी को पांच-पांच हजार दिला दिए जाएंगे। वह बस अपना मुंह बंद रखे। पंचायत का यह फैसला सुनते ही सोनी भागते हुए घर गई और खुद पर मिट्टी का तेल उड़ेलकर आग लगा ली।
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किशोरी से गैंगरेप, फिर जिंदा जलाया
 

सागर। जिले की खुरई तहसील के ग्राम खजरा हरचंद में चार आरोपियों ने 15 वर्षीय किशोरी से गैंगरेप कर उसे जिंदा जलाने की कोशिश की। सोमवार सुबह हुई इस वारदात में 95 फीसदी जल चुकी किशोरी की हालत गंभीर है। चारों आरोपी फरार हैं।

पुलिस के अनुसार खजरा हरचंद निवासी किशोरी सुबह करीब 6.30 बजे घर के पास ही स्थित खेत में गई थी। वहां पहले से ही ताक में बैठे आरोपी मुकेश कुर्मी (25), दीपक विश्वकर्मा (20), मुरली विश्वकर्मा (12) और विवेक कुर्मी (14) ने बारी-बारी से किशोरी से दुष्कृत्य किया। किशोरी ने घटना की जानकारी परिजनों को देने की बात कही। इससे भड़के आरोपी बाद में किशोरी के घर पहुंच गए और उसके ऊपर मिट्टी का तेल डालकर आग लगा दी। बुरी तरह झुलस चुकी किशोरी को स्थानीय डॉक्टरों ने तत्काल सागर जिला अस्पताल रेफर कर दिया।

लपटों से घिरी थी
किशोरी के परिजनों ने बताया कि उन्होंने घर के अंदर कमरे से धुआं उठते देखा। दौड़कर भीतर गए तो देखा कि किशोरी आग की लपटों में घिरी थी। पानी से आग बुझाई और उसे अस्पताल ले गए। बालिका आठवीं कक्षा की छात्रा है।
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नवजात बेटी को सेप्टिक टैंक में फेंका
 

अगरतला। त्रिपुरा में पुलिस ने शनिवार को एक दम्पती को गिरफ्तार कर लिया जिसने अपनी नवजात बच्ची को सेप्टिक टैंक में फेंक दिया क्योंकि गरीबी के कारण यह दम्पती बेटी नहीं चाहता था।

अगरतला से 55 किलोमीटर दूर तेलियामुरा कस्बे में स्थानीय लोगों की सूचना पर पुलिस और अग्निशमनकर्मियों ने तुरंत बचाव कार्य शुरू कर आर्चश्चर्यजनक ढंग से बच्ची को जीवित बचा लिया और निकटवर्ती अस्पताल ले गए।

पुलिस के अनुसार एक दिहाड़ी मजदूर निताई सिंघा (48) ने पुलिस के सामने कबूल किया कि वह और उसकी पत्नी ने जानबूझकर अपनी नवजात बच्ची को सेप्टिक टैंक में फेंक दिया क्योंकि वे बेटी नहीं चाहते थे।

निताई और उसकी पत्नी सीमा के दो नाबालिग बेटे हैं। उन्होंने पुलिस को बताया कि वे एक और बेटा चाहते थे लेकिन जब बच्ची पैदा हुई तो उसे मारने का फैसला लिया। गिरफ्तारी के बाद दम्पती को स्थानीय अदालत में पेश किया अदालत ने पति-पत्नी को 14 दिन की न्यायिक हिरासत में भेज दिया है।
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MATRIMONIAL RELATION