कम उम्र में ब्याह रोकेगा बलात्कार – स्त्री हित की सोच या दमन का नया तरीका
खाप पंचायतें तो अपने फरमानों को लेकर चर्चा में रहती ही हैं लेकिन हाल ही में हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री ओमप्रकाश चौटाला ने राज्य में महिलाओं के प्रति बढ़ती यौन आपराधिक घटनाओं को नियंत्रित करने के लिए खाप पंचायतों के उस बयान या फिर यूं कहें फरमान को सही ठहराया है जिसके अनुसार लड़कियों का विवाह 15 वर्ष की उम्र में कर दिया जाना चाहिए। इससे जल्दी विवाह कर दिए जाने से उनके साथ होने वाली बलात्कार की घटनाओं पर भी लगाम लगाई जा सकती है।
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ओमप्रकाश चौटाला का यह बयान आते ही उनकी मानसिकता को लेकर कई सवाल खड़े हो गए। नारी सशक्तिकरण और उनके अधिकारों की पैरवी करने वाले लोगों के साथ-साथ महिलाओं के एक बड़े समूह को खाप पंचायतों के इस बयान पर चौटाला का स्वीकृति दे देना बिल्कुल रास नहीं आ रहा है। उनका कहना है कि हम 21वीं सदी में जी रहे हैं और हमें महिलाओं को शिक्षित और आत्मनिर्भर बनाने की तरफ ध्यान देना चाहिए। ऐसे में एक वरिष्ठ राजनीतिज्ञ की ऐसी सोच बेहद ओछी प्रतीत होती है। ऐसे लोगों का कहना है कि बलात्कार करने वाला व्यक्ति महिला की ना तो उम्र देखता है और ना ही उसे इस बात से कोई सरोकार होता है कि वह महिला विवाहित है या अविवाहित। वह स्त्री को केवल एक भोग की वस्तु समझता है जिसका उपयोग कभी भी और किसी भी अवस्था में किया जा सकता है। ऐसी घिनौनी मानसिकता वाले व्यक्ति अपनी हवस शांत करने के लिए विशेष तौर पर किसी अविवाहित स्त्री को ही नहीं तलाशते। अगर ओमप्रकाश चौटाला यह मानते हैं कि विवाह बलात्कार से बचने का एकमात्र उपाय है तो उनकी यह सोच वास्तविकता से बहुत दूर है। क्योंकि आंकड़ों पर नजर डाली जाए तो कितने ही ऐसे मसले हमारे सामने हैं जिनमें विवाहित स्त्री को ही कभी अपने परिवार के किसी पुरुष या फिर किसी बाहरी पुरुष की हैवानियत का शिकार होना पड़ा है।
वहीं दूसरी ओर ओमप्रकाश चौटाला के बयान और उससे जुड़े तर्कों को सही ठहराने वाले लोगों का कहना है कि कम उम्र में विवाह करने से लड़के और लड़की दोनों का ही अनैतिक कृत्यों में लिप्त होने की संभावना कम हो जाएगी। पाश्चात्य संस्कृति के प्रभाव और टी.वी, इंटरनेट के बढ़ते उपयोग के कारण आज बहुत सी बातें समय से पहले ही समझ आने लगती हैं जिसका दुष्प्रभाव बच्चों के नैतिक आचरण पर पड़ता है। शारीरिक संबंधों के प्रति उनकी बढ़ती रुचि भी उनके कदम भटका देती है। इसीलिए कानून बनाकर विवाह करने की उम्र को 18 और 21 से घटाकर 15 और 18 कर देनी चाहिए। वे लोग जो यह मानते हैं कि विवाह में देरी होना ही बलात्कार की घटनाओं को बढ़ाता है, का स्पष्ट मत है कि बलात्कार जैसी घटनाओं को नियंत्रित या पूर्ण रूप से समाप्त करने के लिए जितनी जल्दी हो सके विवाह कर देना चाहिए।
एक वरिष्ठ और अनुभवी राजनीतिज्ञ के इस बयान से जुड़े विभिन्न पक्षों पर विचार करने के बाद चंद सवाल हमारे सामने हैं जिनका जवाब ढूंढ़ना नितांत आवश्यक है, जैसे:
1. क्या वाकई विवाह की उम्र को घटाकर या लड़कियों का कम उम्र में विवाह कर उन्हें बलात्कार की घटनाओं से बचाया जा सकता है?
2. क्या खाप पंचायतें और ओमप्रकाश चौटाला जैसे राजनीतिज्ञ स्त्रियों की आत्मनिर्भरता को बाधित करने में विश्वास रखते हैं?
3. क्या कम उम्र में महिलाओं का विवाह करना उनके अधिकारों और उनकी अपेक्षाओं के साथ अन्याय नहीं है?
4. और अंत में सबसे महत्वपूर्ण सवाल – क्या ओमप्रकाश प्रकाश चौटाला स्वयं यह गारंटी ले सकते हैं कि विवाह के बाद कोई भी महिला किसी की हैवानियत का शिकार नहीं बनेगी?
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एक मासूम सी बच्ची आराधना जिसकी उम्र महज 9 साल, हंसती थी तो उसकी हंसी की आवाज सारे परिवार में गुंजने लगती थी. पर पता नहीं अचानक आराधना की हंसी की आवाज कहा गुम हो गई. 9 साल की बच्ची आराधना के साथ जब 40 साल के पुरुष ने शारीरिक शोषण किया तो आराधना समझ ही नहीं पा रही थी कि आखिरकार उसके साथ क्या हो रहा है. आज के समय में आराधना जैसी कहानी हजारों लड़कियों की है जिनका शारीरिक शोषण हो रहा है. लेकिन शारीरिक शोषण की कहानी लड़कियों तक ही सीमित नहीं रह गई है आज छोटी उमर के लड़कों के साथ भी शारीरिक शोषण होता है.
बाली उम्र में शारीरिक शोषण
शारीरिक शोषण की घटनाएं भारत तक ही सीमित नहीं हैं बल्कि यह घटनाएं अब दुनिया भर में देखी जा रही हैं. शारीरिक शोषण की घटनाओं में सबसे हैरान कर देने वाली घटना यह है कि कोई मेहमान बनकर आपके देश में आता है और फिर आपके देश की गरीबी का फायदा उठाकर छोटे-छोटे बच्चों के साथ अपनी शारीरिक हसरतों को पूरा करता है. ऐसा ही कुछ हाल थाईलैंड की राजधानी बैंकॉक से दो घंटे की दूरी पर बसे रिसॉर्ट इलाके का है जहां बड़ी मात्रा में लोग पर्यटन के लिए आते हैं पर वहां के गरीब बच्चों की गरीबी का फायदा उठाकर अपनी शारीरिक जरूरतों को कम उम्र के बच्चों के साथ पूरा करते हैं.
कम उम्र बच्चों की कौन सी जरूरतें है जो उन्हें मजबूर बना देती हैं
छोटी उम्र की ऐसी कौन सी जरूरतें होती हैं जिनके कारण सात से आठ साल तक के बच्चे अपना शारीरिक शोषण करवाने के लिए तैयार हो जाते हैं? किसी ने सच ही कहा है कि भोजन की मजबूरी इंसान से क्या-क्या नहीं कराती है. गरीब देशों के बच्चे ज्यादातर शारीरिक शोषण का शिकार होते हैं क्योंकि वो अपने गरीब परिवार का पेट भरने का एक मात्र सहारा होते हैं. पर सवाल यह है कि पेट की भूख को शांत करने का यह कौन सा तरीका है कि गरीब माता-पिता अपने मासूम बच्चों को शारीरिक प्रताड़ना झेलने के लिए छोड़ देते हैं.
छोटी उम्र के बच्चों के साथ…….
समाज में हर तरह के लोग होते हैं पर हैरानी होती है यह सोच कर कि समाज में ऐसे लोग भी होते हैं जो छोटे-छोटे मासूम बच्चों को अपनी शारीरिक इच्छाओं को पूरे करने की नजर से देखते हैं. समाज ऐसे लोगों के बारे में यह धारणा रखता है कि यह वो लोग होते हैं जो सेक्स में हर दिन कुछ नया चाहते हैं और जब वह किसी एक वर्ग के साथ सेक्स करते-करते थक जाते हैं तो विभिन्न आयु वर्ग पर अपनी नजर रखने लगते हैं. ऐसे लोगों की शारीरिक इच्छाएं एक सीमा के बाद इतनी बढ़ जाती हैं कि वो जानवर के साथ भी सेक्स करने की इच्छाएं रखने लगते हैं. सवाल यह है कि वो कौन से कारण होते हैं कि कुछ लोग छोटी उम्र के बच्चों, जानवरों, पुरुष-पुरुष के साथ, महिला-महिला के साथ अपनी शारीरिक इच्छाओं को पूरा करना चाहते हैं. छोटी उम्र के बच्चों के साथ शारीरिक इच्छाओं को पूरा करने की जो व्यक्ति इच्छा रखता है या फिर छोटी उम्र के बच्चों को मानसिक या शारीरिक आघात देता है उस व्यक्ति को पिडोफाइल कहा जाता है. पिडोफाइल व्यक्ति में छोटी उम्र के बच्चों के साथ सेक्स करने की भावना उत्तेजित होती है पर समाज इन मानसिक बीमारिय़ों में विश्वास नहीं रखता है. सवाल यह है कि क्यों मासूम बच्चे बड़ी मात्रा में पर्यटकों का शिकार हो रहे हैं. क्यों नहीं सरकारें और पुलिस बाल शोषण के लिए बनाए गए कानूनों पर कार्यवाही करती हैं. कब तक उन लोगों को खुले में छोड़ दिया जाएगा जो छोटी उम्र के मासूम बच्चों को शारीरिक और मानसिक आघात पहुंचाते हैं ?
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मुजफ्फरनगर में ऑनर किलिंग : बहन का सिर काटकर प्रेमी के घर फेंका
मुजफ्फरनगर: उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर में झूठी शान के नाम पर एक युवक ने कथित तौर पर अपनी बहन का सिर काटकर उसे मौत के घाट उतार दिया और उसका कटा सिर उसके प्रेमी के घर फेंक दिया।
पुलिस अधीक्षक (शहर) राजकमल यादव ने बताया कि 23 वर्षीय काला ने बुधवार को अपनी 19-वर्षीय बहन का सिर काटकर उसकी हत्या कर दी और फिर उसका कटा सिर उसके 20 वर्षीय प्रेमी के घर फेंक दिया।
घटना जिले के बिहारी गांव की है। लड़की का परिवार उसके प्रेम संबंध के खिलाफ था। बुधवार को काला और उसकी बहन के बीच इसे लेकर झगड़ा हुआ, जिसके बाद काला ने अपनी बहन की हत्या कर दी। पुलिस ने काला के खिलाफ मामला दर्ज कर लिया है।
काला और उसके परिवार के सदस्य घटना के बाद से फरार हैं। घटना के बाद से इलाके में तनाव बना हुआ है, जिसे देखते हुए गांव में सुरक्षा बढ़ा दी गई है।
पुलिस अधीक्षक (शहर) राजकमल यादव ने बताया कि 23 वर्षीय काला ने बुधवार को अपनी 19-वर्षीय बहन का सिर काटकर उसकी हत्या कर दी और फिर उसका कटा सिर उसके 20 वर्षीय प्रेमी के घर फेंक दिया।
घटना जिले के बिहारी गांव की है। लड़की का परिवार उसके प्रेम संबंध के खिलाफ था। बुधवार को काला और उसकी बहन के बीच इसे लेकर झगड़ा हुआ, जिसके बाद काला ने अपनी बहन की हत्या कर दी। पुलिस ने काला के खिलाफ मामला दर्ज कर लिया है।
काला और उसके परिवार के सदस्य घटना के बाद से फरार हैं। घटना के बाद से इलाके में तनाव बना हुआ है, जिसे देखते हुए गांव में सुरक्षा बढ़ा दी गई है।
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महिलाओं को पीछे धकेलता मर्दवादी नजरिया
प्रकृति ने महिला और पुरुष को एक-दूसरे के सहयोगी और पूरक के रूप में पेश किया है लेकिन सामाजिक दृष्टिकोण से देखा जाए तो इन दो अनमोल कृतियों को हम हमेशा प्रतिस्पर्धा और भेदभाव जैसे मसलों में ही उलझा हुआ देखते हैं. निश्चित रूप से इसके पीछे महिलाओं को पुरुषों की तुलना में कमतर और दूसरे दर्जे का मानने जैसी प्रवृत्ति विद्यमान रही है. हालांकि पिछले कुछ वर्षों में महिला उत्थान और उन्हें समान अधिकार दिलवाने जैसी मुहिम में तेजी आई है लेकिन जमीनी स्तर पर महिलाओं के हालातों में आज भी हम बहुत अधिक परिमार्जन नहीं देख सकते क्योंकि आज के आधुनिक युग में भी महिलाओं को अपनी प्रॉपर्टी समझने वाले पुरुषों की कोई कमी नहीं है|
समाज अभी भी पुरुष प्रधान है
देश हो या विदेश प्राय: सभी समाज अपने मौलिक रूप में पुरुष प्रधान रहे हैं जिसका खामियाजा हमेशा महिलाओं को ही भुगतना पड़ता है. यूं तो प्रारंभिक समय से ही महिलाओं को पुरुषों के अधीनस्थ रखने का प्रचलन रहा है लेकिन हाल ही की एक घटना इस परंपरा को और अधिक पुख्ता करते हुए यह प्रमाणित कर रही है कि भले ही समय बदल गया हो लेकिन मानव स्वभाव और नजरिया कभी परिवर्तित नहीं हो सकता.
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