Sunday, October 14, 2012

उम्र के नाजुक मोड़ पर


किशोर उम्र के बदलावों में सबसे अहम हैं शारीरिक बदलाव। अचानक होने वाले बदलावों को मन स्वीकार नहीं कर पाता। किसी से शेयर करने में हिचक होती है, लगता है मानो सारी आजादी छिन गई हो। लडकों-लडकियों में अलग-अलग तरह के बदलाव होते हैं। यही वह उम्र भी है, जब मानसिक-भावनात्मक और बौद्धिक विकास की प्रक्रिया गति पकडती है। मन किसी एक बात पर ठहर नहीं पाता और दिमाग सवालों से भर उठता है।
उम्र का अजीब खेल
1. मन में कई सवाल पनपने लगते हैं। क्यों? कब? कहां? ऐसे प्रश्न इसी उम्र में जन्मते हैं।
2. आजादी पर थोडा भी प्रतिबंध उन्हें बाधक लगता है। वे स्कूल के नियमों और माता-पिता के आदेशों को चुनौती देने लगते हैं।
3. अपने ढंग से चीजों को सही-गलत और अच्छा-बुरा समझने की बुद्धि आ जाती है। यह सामान्य-सहज प्रक्रिया है।
4. प्री-टीन और टीनएज में अचानक एहसास होने लगता है कि हम कुछ भी कर सकते हैं और जो करेंगे, वह गलत नहीं होगा। यह एक बडा बदलाव होता है, जो माता-पिता के लिए मुश्किलें खडा करता है।
5. खुद को आकर्षक महसूस करने लगते हैं टीनएजर्स। खास तौर पर लडकियों में आईने में खुद को निहारना, सौंदर्य प्रसाधनों का प्रयोग, ड्रेसेज को लेकर सजगता जैसे तमाम गुण इसी उम्र में पनपते हैं।
6. दोस्तों के साथ घंटों समय बिताने, फोन करने और माता-पिता से कुछ छिपा लेने की मानसिकता भी इसी उम्र की देन है।
7. मूड स्विंग, भावनात्मक उथल-पुथल, अनावश्यक रुलाई जैसे लक्षण भी हार्मोनल बदलाव के कारण होते हैं।
मुश्किल है बहुत फिर भी
बच्चों का टीनएज में आना माता-पिता के लिए एक साथ कई मुश्किलें खडी करता है। इस उम्र में किशोर अपनी रचनात्मकता के शीर्ष पर होते हैं, लेकिन अगर चूक हो जाए तो विध्वंसक होने में भी देर नहीं लगती। ऐसी स्थिति में माता-पिता को किशोर मनोविज्ञान के इन तथ्यों को जरूर ध्यान में रखना चाहिए-

1. आम तौर पर किशोरों के लिए शारीरिक बदलावों को समझ पाना मुश्किल होता है। वे चिडचिडे हो जाते हैं, साथ ही साथियों के साथ अपने बदलावों की तुलना करके वे और भी चिंतित हो जाते हैं। उन्हें समझाएं कि आप भी इसी तरह बडे हुए थे और इसमें असामान्य कुछ भी नहीं। उन्हें अपने अनुभव सुनाएं।
2. उनके शारीरिक बदलावों, खास तौर पर वजन बढने-घटने को लेकर उन्हें ताने न दें।
3. अगर बढते बच्चे ज्यादा प्रतिक्रियावादी हो जाएं, हर बात पर जवाब देने लगें तो बजाय उन्हें सजा देने के, उनकी बातों को ध्यान से सुनें और उनके स्तर पर जाकर उनके तर्को को समझने की कोशिश करें।
4. छोटी-छोटी बातों को नजरअंदाज करना सीखें। उनकी ड्रेसेज, हेयर स्टाइल्स पर कमेंट करने के बजाय यह ध्यान दें कि उनका सर्किल कैसा है। दोस्त गलत दिशा में तो नहीं ले जा रहे! यानी छोटे बदलावों के बजाय जो बडे प्रश्न हैं, उन्हें सुलझाने की कोशिश करें।
5. उन्हें जिम्मेदारियां सौंपें। अपने छोटे-छोटे निर्णय खुद लेने को प्रोत्साहित करें, ताकि वे अपनी योग्यता साबित कर सकें।
6. यदि आपको लगता है कि वे नियंत्रण से बाहर हो रहे हैं, दोस्तों के साथ ज्यादा वक्त बिता रहे हैं तो उनसे दोस्तों को घर लाने को कहें। हमउम्र दोस्तों की तरह व्यवहार करें। जरूरत पडे तो मनोवैज्ञानिक की राय भी लें।
7. दूसरे अभिभावकों के अनुभवों का फायदा उठाएं। उनसे पैरेंटिंग टिप्स लें।

पारिवारिक मसला
1. 90 फीसदी अवसादग्रस्त किशोर घरेलू विवादों के चलते परेशान होते हैं। हालांकि उन्हें झगडे का कारण नहीं पता होता।
2. 46 फीसदी अवसादग्रस्त टीनएजर अच्छे से अच्छा परिणाम लाने के माता-पिता के दबाव से परेशान हैं।
3. 50 फीसदी इसलिए अवसाद में हैं, क्योंकि उनके अभिभावक उनकी जिंदगी के हर पहलू को नियंत्रित करना चाहते हैं।
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आत्महत्या को मजबूर होती बालाएँ
"महिला हो या पुरुष, अपनी महत्वाकांक्षाएं पूर्ण करने के लिए अनैतिक आचरणों का सहारा लेने वाले कैसे आश्वस्त हो सकते हैं ही उनके साथ नैतिक व्यव्हार ही होगा"यह एक कटु सत्य है हमारे पुरुष सत्तात्मक में समाज प्राचीन काल से ही नारी को मात्र उपभोग की वस्तु समझा गया और जब भी मौका मिला उसका शोषण किया गया,प्रताड़ित किया गया. . आजादी के पैसंठ वर्षों के बाद आज भी कमोवेश यही स्थिति बनी हुई है.कोई विशेष बदलाव पुरुष मानसिकता में देखने को नहीं मिलता.यद्यपि स्वतन्त्र भारत की सरकार ने महिलाओं के हितों की रक्षा में अनेक कानून बनाये हैं.महिलाओं को समानता का दर्जा देने के लिए महिला आंदोलनों और महिला आयोग के प्रयासों से महिलाओं को बहुत कुछ सम्माननीय स्थान प्राप्त हुआ है. जिससे महिलाओं को शिक्षा पाने और प्रत्येक क्षेत्र में रोजगार के अवसर प्राप्त हुए,आज महिला पुरुष से कंधे से कंधा मिला कर हर क्षेत्र में आगे बढ़ रही है.
परन्तु कुछ महिलाओं ने अपने जीवन की ऊंचाइयों को छूने के लिए उचित और अनुचित साधनों का इस्तेमाल किया .उसने पुरुष की कमजोरी का लाभ उठा कर अपने करिअर को नए आयाम देने के प्रयास किये उसने अपनी सुंदरता को निरंतर भुनाने का प्रयास किया.अपने कैरिअर में आगे बढ़ने के लिए उसने अपने तन का सौदा करने से भी परहेज नहीं किया.दूसरी तरफ़ पुरुष की लालची प्रवृति ने अपने पद अपने रुतबे अपनी दौलत का लाभ उठाया और समय समय पर महिला कर्मचारियों का शोषण करने से परहेज नहीं किया.अपनी इच्छा पूर्ती के लिए उनका इस्तेमाल किया और स्वार्थ सिद्ध हो जाने पर उनसे किनारा कर लिया या फिर उन्हें अपने मकसद पूरे करने के लिए अनेक रूप में प्रताड़ित किया. जिसके कारण अनेक बार उस महत्वाकाक्षी महिला को आत्महत्या तक मजबूर होना पड़ता है. पिछले माह में अचानक प्रकाश में आयीं अनेक ऐसे ही दर्दनाक घटनाएँ यही सब कुछ बयां करती है,अब वह चाहे फिजा की संदेहास्पद मौत हो या दीपिका की आत्महत्या का मामला हो इस प्रकार की घटनाओ का क्रम जारी है.यह भी हो सकता है कि मीडिया में वही ख़बरें जनता के समक्ष आ पाती है जो हाई प्रोफाईल व्यक्तियों से जुडी होती हैं और बहुत सारी घटनाएँ जनता के समक्ष नहीं आ पातीं.जो छोटे कद के बाहुबली से जुडी होती हैं.
ऐसी घटनाओं के लिए जितने जिम्मेदार हमारे बड़ी पहुच वाले अमीर,सत्ताधारी,या पदाधिकारी जिम्मेदार हैं ,उतनी ही जिम्मेदार वे महिलाएं भी हैं जो अपनी उन्नति के लिए मर्दों की कमजोरी का लाभ उठाती हैं,और अनैतिक आचरणों के सहारे से ऊंचाइयों पर पहुँचने की योजना बनाती हैं. उनसे संपर्क बढाकर अपना रुतबा बढ़ाने का प्रयास करती हैं,उन्हें अपने मोहजाल में फंसाती हैं और स्वयं मकडजाल में फंस कर अपने पूरे परिवार को जोखिम में डाल देती हैं. जिसका अंत उनकी आत्महत्या से होता है या फिर सत्ताधारी से,ऊंचे रुसूख वाले व्यक्ति से दुश्मनी की कीमत अपनी जान देकर गंवानी पड़ती है.
इन हालातों के लिए सिर्फ हाईप्रोफाईल पुरुषों को ही दोष देना उचित नहीं माना जा सकता.यद्यपि इन अपराधों में शामिल पुरुष को, महिलाओं को शोषित करने उन्हें बरगलाने, बहका ने के अपराध से मुक्त नहीं किया जा सकता. अपनी सत्ता या पद का दुरूपयोग कर किसी भी महिला को प्रताड़ित करना, शोषित करना जघन्य अपराध तो है ही. परन्तु महिलाओं का अपने स्वार्थ पूर्ती के लिए पुरुषों की कमजोरी का लाभ उठाना, उन्हें प्रेमपाश में फंसाना, उनकी तरफ असामान्य तरीके से झुकना महिलाओं की अति महत्वाकांक्षा का परिणाम है, जो उन्हें दुर्गति और आत्महत्या तक ले जाता है.या पूरे जीवन को नरकतुल्य और बदनामी के साथ जीने को मजबूर करता है. यह तो सत्य है यदि आप अनैतिक आचरणों का सहारा लेकर अपनी उन्नति का मार्ग प्रशस्त करते हैं तो आप कैसे आश्वस्त हो सकते हैं,आपके साथ नैतिक व्यवहार ही होगा.

 

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